Europe 2031

AI को गलत समझने का हमारे लिए क्या मतलब है?

Daan Juijn, Stan van Baarsen, Judith Dada, Maximilian Negele, Lily Stelling, Philip Fox, Alex Petropoulos, and Michiel Bakker.लेखन और संपादन: टॉम चिवर्स।

11 जून 2026

यूरोपीय संघ के बारह सितारे पिक्सल की धूल में बिखरते हुए, बीच में यूरोप के दरकते नक्शे की पच्चीकारी को घेरे हुए।

एआई जिस रफ़्तार से आगे बढ़ रहा है, उसे देखते हुए युद्ध के बाद के पूरे यूरोपीय इतिहास में सबसे बड़े राजनीतिक एजेंडे की ज़रूरत है। अगर हमने अभी कदम नहीं उठाए, तो यूरोप अपने भविष्य के फ़ैसले खुद करने की ताक़त हमेशा के लिए खो देगा। हम आर्थिक और राजनीतिक, दोनों मोर्चों पर पूरी तरह किनारे कर दिए जाएँगे। हमारे पास ऐसे मूल्य तो होंगे जिनकी हम रक्षा नहीं कर पाएँगे, ऐसा सोशल वेलफेयर सिस्टम होगा जिसके लिए हमारे पास फ़ंड नहीं बचेगा, ऐसे खतरे होंगे जिनसे हम निपट नहीं पाएँगे, और हमारा यह पूरा संघ (यूनियन) ताश के पत्तों की तरह बिखर जाएगा।

मार्च 2031 - वॉशिंगटन,डी.सी.

कैरोलिन अपने चेहरे पर ठंडा पानी डालती है और बाथरूम के आईने में खुद को देखती है। उसके हाथ कांप रहे हैं। वह सिंक के किनारे को कसकर पकड़ती है और इस घबराहट के गुज़रने का इंतज़ार करती है। ऊँचाई पर बनी एक छोटी सी खिड़की से उसे वॉशिंगटन के आसमान का एक हिस्सा दिखाई देता है, जो सपाट और चमकदार है।

इसी कॉरिडोर में आगे, छह लोग मिलकर पूरे यूरोप महाद्वीप की किस्मत का फैसला कर रहे हैं। उसे नहीं पता कि उसकी कही किसी बात का वहाँ कोई असर होगा या नहीं।

पर उसे शक है कि कोई असर नहीं होने वाला।

यह कहानी यूरोप के धीरे-धीरे खत्म होते वजूद के बारे में है: कि कैसे एआई इसे इस बर्बादी की तरफ ले जा रहा है, और इस रास्ते को बदलने के लिए अभी भी क्या किया जा सकता है।

यह कहानी ब्रसेल्स में काम करने वाली फ्रांसीसी पॉलिसी वर्कर कैरोलिन डुबोइस और तेज़ी से बढ़ रही एक एआई कंपनी के जर्मन फाउंडर क्रिश्चियन वोग्ट (जो हाल ही में सिलिकॉन वैली शिफ्ट हुए हैं) जैसे काल्पनिक किरदारों के ज़रिए सामने आती है। भले ही ये किरदार काल्पनिक हैं, लेकिन जिन परिस्थितियों से ये गुज़रते हैं, वे आज के असली ट्रेंड्स पर आधारित हैं और उन्हें पूरी तरह हकीकत के करीब रखा गया है।

यह समझने के लिए कि यूरोप आने वाली एआई क्रांति का यह मौका कैसे गंवाने की कगार पर है, हमें सबसे पहले 2025 की शुरुआत में वापस जाना होगा—क्योंकि यह कहानी पहले ही शुरू हो चुकी है।

जनवरी 2025 – डीपसीक करो और पाओ

कैरोलिन डुबोइस का दफ़्तर इस वक्त सरगर्मियों से भरा है। आज सुबह ही चीनी कंपनी ‘डीपसीक’ ने अपना नया एआई (AI) मॉडल ’ आर 1’ (आर 1) लॉन्च किया है। यह मॉडल न केवल बेहद किफ़ायती है, बल्कि उतना ही असरदार भी है। भले ही इसे बनाने में किसी भी यूरोपीय कंपनी की कोई भूमिका नहीं रही है, फिर भी इस वक्त ब्रसेल्स के नीति-निर्माताओं के बीच इसे लेकर ज़बरदस्त हलचल और गर्मागर्मी का माहौल है।

कैरोलिन, यूरोपियन कमीशन के डायरेक्टरेट-जनरल फॉर ट्रेड एंड इकोनॉमिक सिक्योरिटी’ (डी जी ट्रेड) में डिजिटल प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में काम करती हैं। यह कमीशन का वह संवेदनशील विभाग है जो वैश्विक प्रशुल्क और निर्यात नियंत्रण जैसे रणनीतिक मामलों को संभालता है। 28 साल की उम्र में, उन्हें यहाँ काम करते हुए तीन साल हो चुके हैं और वे अपने सहयोगियों व वरिष्ठ अधिकारियों के बीच अपनी साख बना रही हैं। लेकिन अपने बाकी साथियों के उलट, वह यूरोप के भविष्य को लेकर अंदर से गंभीर रूप से चिंतित हैं, और डीपसीक की इस नई कामयाबी से उन्हें कोई तसल्ली नहीं मिली है। वह हाल ही में सिलिकॉन वैली गई थीं।। भौगोलिक रूप से भले ही यह जगह ब्रसेल्स से करीब 9,000 किलोमीटर दूर हो, लेकिन दोनों के बीच का मानसिक फासला इससे कहीं ज़्यादा महसूस होता है। कैलिफ़ोर्निया में यह बात अब एक स्थापित सच मानी जा चुकी है कि एआई एक नई औद्योगिक क्रांति के युग की सूत्रपात कर रहा है; जबकि यूरोपियन कमीशन के दफ़्तरों में बैठकर इस पर चर्चा करना महज़ एक साइंस फ़िक्शन जैसा लगता है।

आर 1 की इस कामयाबी ने कैरोलिन के साथियों में एक नया उत्साह भर दिया है। वे इसे इस बात का पुख्ता सबूत मान रहे हैं कि सिलिकॉन वैली के दिग्गजों जैसे बेतहाशा वित्तीय संसाधनों के बिना भी दुनिया का सबसे एडवांस्ड एआई मॉडल ट्रेन करना मुमकिन है। यूरोप के नीति-निर्माताओं को यह विचार बहुत लुभा रहा है कि अमेरिकियों को उनकी ही चाल में मात दी जा सकती है—यानी छोटा, फुर्तीला और समझदार बने रहकर भी उन सैकड़ों अरब डॉलर के बिना बेहतर परिणाम दिए जा सकते हैं, जो अमेरिकी कंपनियाँ अपने आलीशान डेटा सेंटर्स और विशाल मॉडल ट्रेनिंग पर पानी की तरह बहा रही हैं।

यह सोच पहली नज़र में तार्किक भी लगती है। माना जा रहा है कि डीपसीक ने ओपनएआई के चैटजीपीटी या एंथ्रोपिक के क्लॉड की तुलना में बेहद मामूली लागत में आर 1 को तैयार कर लिया है, लेकिन क्षमता के मामले में यह लगभग उनके बराबर ही शक्तिशाली है। यहाँ तक कि इसमें वह नया ‘रीज़निंग’ फ़ीचर भी शामिल है जिसे अमेरिकी मॉडल्स ने अभी-अभी पेश करना शुरू किया है; इसके तहत मॉडल एक वर्चुअल स्क्रैचपैड पर अपनी सोचने की पूरी प्रक्रिया को उपयोगकर्ता के सामने पारदर्शी तरीके से रखता है। सबसे बड़ी बात यह है कि इसके वेट्स—यानी वे गणितीय मान जो किसी मॉडल को उसका वजूद देती हैं—सबके लिए ओपन-सोर्स (सार्वजनिक) हैं। इसका मतलब है कि कोई भी देश या व्यक्ति अमेरिकी टेक्नोलॉजी कंपनियों पर अपनी निर्भरता खत्म करके, इस मॉडल को अपने खुद के बुनियादी ढाँचा पर पूरी तरह मुफ़्त में चला सकता है।

ब्रसेल्स के इस उम्मीद भरे माहौल से थोड़ी हिम्मत मिलने के बावजूद, कैरोलिन अभी इस जश्न में आँख मूँदकर शामिल होने के लिए तैयार नहीं हैं। वह उन ज़्यादा संभलकर चलने वाले विशेषज्ञों की दलीलों को ध्यान से सुनती हैं जो यह याद दिलाते हैं कि तकनीकी कुशलता (Efficiency) में इस तरह के बड़े सुधार आना कोई अनोखी बात नहीं है—एंथ्रोपिक, गूगल डीपमाइंड और ओपनएआई अक्सर ऐसे रास्ते खोजते रहते हैं। डीपसीक के पास काबिल रिसर्चर्स की टीम है और उन्होंने बहुत तेज़ी से काम किया है, यह सच है, लेकिन जल्द ही वे कंप्यूटिंग पावर(गणनीय शक्ति) की भारी कमी के चक्रव्यूह में फँस जाएंगे। चीन के पास अब मॉडल्स को बड़े पैमाने पर ट्रेन करने के लिए ज़रूरी ‘कंप्यूट’ क्षमता बची ही नहीं है, क्योंकि अमेरिका ने उन अत्याधुनिक एआई चिप्स के निर्यात पर सख्त पाबंदी लगा दी है जिन्हें चीन खुद नहीं बना सकता। इन जानकारों का साफ तर्क है कि अगर आपके पास पहले से ही असीमित कंप्यूटिंग पावर मौजूद हो, तो कलन-विधि में सुधार और आसान संक्षेप मार्ग खोजना कहीं ज़्यादा आसान हो जाता है। खुद डीपसीक के सीईओ ने भी इस बात को स्वीकार किया था कि उनकी सबसे बड़ी रुकावट अमेरिकी चिप एक्सपोर्ट बैन ही है।

यही वजह है कि सिलिकॉन वैली इस आर 1 के आने से ज़रा भी विचलित नहीं हुई है। वहाँ के विशाल-संसाधक एआई बुनियादी ढाँचे में अपने भारी-भरकम निवेश की रफ़्तार को बिल्कुल धीमा नहीं कर रहे हैं। आर 1 के लॉन्च के महज़ कुछ ही दिनों के भीतर, ओपनएआई ने अपना ओ3-मिनी मॉडल बाज़ार में उतार दिया, जो क्षमता के मामले में आर 1 से कहीं आगे और ज़्यादा प्रभावशाली है। यह इस बात का साफ संकेत है कि अमेरिका में तरक्की की रफ़्तार अब भी बेहद तेज़ है।

पर ब्रसेल्स में इस ओ3 की खबर पर किसी ने ध्यान तक नहीं दिया। इसे तवज्जो देने का सीधा मतलब यह स्वीकार करना होता कि एआई की यह अंधी दौड़ रुकने वाली नहीं है, और इसे उन बड़ी अमेरिकी कंपनियों द्वारा आगे बढ़ाया जा रहा है जिनके सीईओ पर कभी भरोसा नहीं किया जा सकता।

कैरोलिन खुद असमंजस में हैं कि वह किसका पक्ष लें। तीन हफ़्ते पहले ही वह कैलिफ़ोर्निया में थीं, और वहाँ उन्होंने अपनी आँखों से जो कुछ देखा था, वह उनके ज़हन से निकल ही नहीं रहा है।

वहाँ वह क्रिश्चियन वोग्ट के पास रुकी थीं, जो करीब पाँच साल पहले बर्कले में एकछात्र आदान-प्रदान कार्यक्रम के दौरान उनके पुराने दोस्त बने थे; कैरोलिन फ्रांस के साइंसेज पो से थीं और क्रिश्चियन टीयू म्यूनिख से—जो यूरोप की दो सबसे प्रतिष्ठित यूनिवर्सिटीज़ हैं। क्रिश्चियन तीन साल पहले ही सैन फ़्रांसिस्को शिफ्ट हो गए थे—ठीक उसी समय जब कैरोलिन ने कमीशन में अपनी नौकरी शुरू की थी—ताकि वे इमेज और वीडियो मॉडल बनाने वाली अपनी खुद की एक कंपनी शुरू कर सकें। उनका वह एआई स्टार्टअप अभी आकार में बहुत छोटा था, लेकिन हाल ही में उन्होंने ‘सीरीज़ A’ फ़ंडिंग (प्रथम चरण’ वित्तपोषण )का एक बड़ा राउंड पूरा किया था। अपने मिलनसार और ज़िंदादिल स्वभाव की वजह से क्रिश्चियन वहाँ तकनीकी जगत में हर किसी को करीब से जानते थे।

उस पूरे दौरे ने कैरोलिन को झकझोर कर रख दिया था। क्रिश्चियन की टीम के काम करने का तरीका किसी पागलपन से कम नहीं था—हफ़्ते में सत्तर-सत्तर या अस्सी-अस्सी घंटे लगातार काम करना, और थककर लोगों का ऑफ़िस के फर्श या सोफ़े पर ही सो जाना। और जब क्रिश्चियन उन्हें हेज़ वैली में एक दूसरे स्टार्टअप फ़ाउंडर के घर रात्रिभोज में ले गया, तो वहाँ चल रही बातें तो कैरोलिन के सिर के ऊपर से गुज़र गईं। ऐसा इसलिए नहीं था कि वे बातें बहुत ज़्यादा तकनीकी थीं, बल्कि इसलिए क्योंकि वहाँ मौजूद लोगों के भीतर यह अटूट विश्वास था कि दुनिया बहुत जल्द पूरी तरह से बदलने वाली है। एक अतिथि ने बड़े ही सामान्य लहजे में कहा, “मुझे लगता है कि जनवरी 2026 तक मेरा अस्सी परसेंट से ज़्यादा कोड अकेले क्लॉड ही लिख रहा होगा।” खुद उस पार्टी के होस्ट ने बताया कि उन्होंने जूनियर इंजीनियरों को नौकरी पर रखना ही बंद कर दिया है, क्योंकि बहुत जल्द चैटजीपीटी प्रारंभिक स्तर की कोडिंग किसी भी नए लड़के से बेहतर करने लगेगा। बातों-बातों में किसी ने यह भी कह दिया कि उन्हें लगता है कि ‘आर्टिफिशियल जनरल इंटेलिजेंस’ (AGI/एजीआई)—यानी एक ऐसा एआई जो ज़्यादातर दिमागी कामों में किसी भी इंसान से कहीं बेहतर साबित होगा—मुश्किल से दो या तीन साल की दूरी पर है। कैलिफ़ोर्निया के उस माहौल में कैरोलिन ने सवाल पूछा था कि अगर ऐसा है, तो यूरोप का क्या होगा, क्योंकि वहाँ तो इस टक्कर का कोई कॉम्पिटिटिव एआई सेक्टर ही मौजूद नहीं है? लेकिन उस मेज़ पर बैठे किसी भी शख्स ने यूरोप के बारे में सोचा तक नहीं था—सिवाय इसके कि वह नियमों और विनियमों को लेकर उनके काम में अड़ंगा लगाने वाला एक संभावित सिरदर्द बन सकता है।

क्रिश्चियन के अपार्टमेंट लौटते समय एक रोबोटिक वेमो (Waymo) टैक्सी में बैठे हुए, कैरोलिन ने उससे कहा कि यह पूरी यात्रा उन्हें अंदर से बहुत बेचैन और उलझन में डालने वाली लगी है। क्रिश्चियन इस बात पर हँस पड़ा और उन्हें दिलासा देते हुए बोला कि सिलिकॉन वैली में कुछ महीने गुज़ारने के बाद, वह खुद भी इस ‘AGI की आहट को महसूस’ करने लगेंगी। कैरोलिन सोचने पर मजबूर हो गईं कि क्या क्रिश्चियन और उसके जैसे लोग किसी अजीब से भ्रम के दायरे या किसी पंथ (Cult) का हिस्सा बन चुके हैं, या फिर वह खुद एक ऐसी पुरानी दुनिया में जी रही हैं जो तेज़ी से अतीत के पन्नों में दफ़्न होने जा रही है।

ब्रसेल्स लौटने के बाद, उन्होंने अपनी इस यात्रा के अनुभवों को अपने डायरेक्टर के साथ साझा करने का मन बनाया था, लेकिन उन्हें लगा कि इस माहौल को शब्दों में बयां करना नामुमकिन है। जिन लोगों से उन्होंने वहाँ बात की थी, वे उनके जीवन में मिले सबसे तेज और समझदार लोगों में से थे। वे पूरी तरह शांत, बेहद व्यावहारिक और हर जानकारी से लैस थे। उनके भीतर से यह आवाज़ आ रही थी कि उनकी बातों को बहुत गंभीरता से लिया जाए और दूसरों को भी इसके प्रति सचेत किया जाए। पर वे दावे दुनिया के इस दूसरे कोने में, यूरोपियन कमीशन के एक शांत सभागार में सुनने पर किसी को भी पागलपन का प्रलाप लग सकते थे। इसलिए उन्होंने चुप रहना ही बेहतर समझा।

डीपसीक आर 1 के रिलीज़ होने के ठीक अगले दिन, उनके फ़ोन की स्क्रीन चमकती है। यह क्रिश्चियन का मैसेज था।

क्रिश्चियन: तो क्या ब्रसेल्स में इस वक्त डीपसीक की जीत का जश्न मनाया जा रहा है???
कैरोलिन: मेरे डायरेक्टर को तो यही लग रहा है कि इससे साबित हो गया कि हम भी इस रेस में बराबरी कर सकते हैं...
क्रिश्चियन: हाहा, कमाल है!
क्रिश्चियन: इस पूरे मामले की असली सीख यह है कि रीज़निंग मॉडल्स सच में काम करते हैं और चीन उन्हें अपने दम पर बना सकता है।
क्रिश्चियन: और हाँ,ओ3-मिनी उससे कहीं बेहतर है, लेकिन आपके वहाँ कोई उसके बारे में बात तक नहीं कर रहा।
क्रिश्चियन: आपके डायरेक्टर को एक बार सैन फ़्रांसिस्को का चक्कर लगाना चाहिए।
कैरोलिन: काश, ऐसा हो पाता।

वह फ़ोन रख देती है। उसे पक्का नहीं पता कि क्रिश्चियन सही है या नहीं, लेकिन उसे यह भी नहीं लगता कि वह गलत है। आर 1 को लेकर सावधानी बरतने की बातें उसे सही लगती हैं। और उत्साह भरी बातें भी उसे सही लगती हैं।

फ़रवरी 2025 – प्लग, बेबी, प्लग

आर 1 के तीन हफ़्ते बाद, इमैनुएल मैक्रॉन पेरिस में एआई एक्शन समिटकी मेज़बानी करते हैं।

इस समिट सीरीज़ की शुरुआत सुरक्षा और अंतरराष्ट्रीय तालमेल को ध्यान में रखकर की गई थी – UK में हुए 2023 के एडिशन को ‘एआई ’ सेफ्टी समिटकहा गया था – लेकिन 2025 का यह एडिशन बिल्कुल अलग है। भू-राजनीतिक माहौल अब और सख्त हो चुका है। रूस यूक्रेन में धीरे-धीरे आगे बढ़ रहा है; डोनाल्ड ट्रंप को व्हाइट हाउस में वापस आए महज़ दो हफ़्ते हुए हैं और वे अभी से ही यूरोपीय सामानों पर टैरिफ लगाने की धमकी दे रहे हैं। अब यूरोप का पूरा ध्यान सुरक्षा के बजाय प्रतिस्पर्धा (कंपेटिटिवनेस) पर है। और यह सही समय भी है: डीपसीक ने साफ़ तौर पर दिखा दिया है कि बराबरी करना मुमकिन है, और शायद यह काफी सस्ता भी हो सकता है। यूरोप अब यह कड़ा संकेत देना चाहता है कि वह एआई को पूरी गंभीरता से ले रहा है।

यूरोपीय आयोग की अध्यक्ष उर्सुला वॉन डेर लेयेन ने €200 बिलियन के ‘Investएआई Fund’ की घोषणा की है। इसमें €20 बिलियन की ‘एआई Gigafactories Initiative’ भी शामिल है, जिसके तहत यूरोप की सरज़मीं पर चार से पाँच बड़े एआई डेटा सेंटर बनाए जाएंगे। इमैनुएल मैक्रॉन फ्रांस को यूरोप में एआई बुनियादी ढाँचा खड़ा करने के लिए सबसे मुफीद जगह बताते हैं: यहाँ की भरपूर न्यूक्लियर पावर की बदौलत डेवलपर्स बस ‘प्लग-इन’ करके काम शुरू कर सकते हैं।

ब्रसेल्स में तीन साल बिताने के बाद, कैरोलिन जानती हैं कि सिर्फ़ हेडलाइंस में दिखने वाले बड़े आंकड़ों पर भरोसा नहीं करना चाहिए। यह €200 बिलियन की रकम ज़्यादातर पहले से मौजूद फंड्स को ही नए तरीके से पेश करने जैसा है, और इसमें यह मान लिया गया है कि यूरोप का निजी उद्योग जगत भी अपना पैसा इसमें लगाएगा। इसका सिर्फ़ एक छोटा सा हिस्सा ही वास्तव में नया है, और वह भी पाँच सालों की अवधि में बंटा हुआ है। जब वह इसकी तुलना अमेरिकी हाइपरस्केलर्स के डेटा सेंटर इन्वेस्टमेंट से करती हैं—जिनके 2025 में $400 बिलियन से ज़्यादा होने का अनुमान है—तो वह सिहर उठती हैं। फिर भी, उन्हें एक उम्मीद है कि शायद अब माहौल बदल रहा है और यूरोप की नींद टूट रही है।

क्रिश्चियन: 200 बिलियन?
कैरोलिन: यह ज़्यादातर एक महत्वाकांक्षी सोच है।
क्रिश्चियन: अमेरिकियों के पास असली पैसा है।
क्रिश्चियन: टेक्सास वाला प्रोजेक्ट अभी बन रहा है।
क्रिश्चियन: जैसे वहाँ बुलडोज़र चल रहे हैं।
कैरोलिन: मुझे पता है।
क्रिश्चियन: सैम ऑल्टमैन, लैरी एलिसन और मासायोशी सोन को डोनाल्ड ट्रंप के साथ एक मंच पर देखकर ब्रसेल्स को कैसा लग रहा है?
कैरोलिन: खैर, वे इससे बिल्कुल खुश नहीं हैं।

माहौल बदला हो या न बदला हो, लेकिन जब अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस समिट में यूरोप-विरोधी आक्रामक भाषण देते हैं, तो कुछ हद तक सकारात्मक ऊर्जा फीकी पड़ जाती है। दो दिन बाद म्यूनिख सिक्योरिटी कॉन्फ्रेंस में भी वे वही रुख अपनाते हैं। कैमरों में साफ़ देखा जा सकता है कि वहां मौजूद यूरोपीय नेता किसी तरह अपनी नाराजगी को दबाने की कोशिश कर रहे हैं।

इसके बाद के हफ़्तों में, कैरोलिन के बॉस एक ठोस नतीजे पर पहुँचते हैं। अटलांटिक के दोनों ओर के देशों के बीच का रिश्ता असल में टूट चुका है। अब वॉशिंगटन पर भरोसा नहीं किया जा सकता—न तो रक्षा के मामले में, न ही ऊर्जा के मामले में, और अब यह भी पूरी तरह साफ़ हो गया है कि टेक्नोलॉजी के मामले में तो बिल्कुल भी नहीं। यूरोप की राजधानियों में ‘सॉवरेनिटी’ (संप्रभुता) नया चर्चित शब्द बन गया है।

लेकिन सॉवरेनिटी का ऐलान करना उसे हकीकत में बदलने से कहीं ज़्यादा आसान है, और यह साफ़ नहीं है कि इस कोशिश का कोई नतीजा निकलेगा भी या नहीं; कम से कम एआई के मामले में तो ऐसा ही दिखता है। कैरोलिन को लगता है कि भले ही नेता नई टेक्नोलॉजी की परवाह करने का दावा करते हों, लेकिन असल में उनके मन में इसे लेकर पुराना शक अभी भी गहरा है। उनके एक सहकर्मी, जो एक बेहद समझदार और सीनियर पॉलिसी ऑफ़िसर हैं, ने जेडी वेंस के भाषणों के कुछ समय बाद लंच के दौरान यह इशारा किया कि उन्हें नहीं लगता कि एआई को चलाने के लिए बहुत बड़े डेटा सेंटर्स की कोई ज़रूरत है; और ऐसा उन्होंने ठीक इसलिए कहा क्योंकि सैम ऑल्टमैन, लैरी एलिसन और डोनाल्ड ट्रंप, इन सबने एक मंच पर खड़े होकर कहा था कि इनकी ज़रूरत है। कैरोलिन को यह सोच सरल लेकिन समझ में आने वाली लगती है: ब्रसेल्स में डोनाल्ड ट्रंप और सिलिकॉन वैली के दिग्गजों को लेकर अविश्वास बहुत गहरा है। लेकिन उन्हें इस बात की चिंता है कि सिर्फ़ इसलिए कि वे कह रहे हैं कि मौसम साफ़ है, इसका मतलब यह नहीं है कि बाहर सचमुच अंधेरा नहीं है।

अगस्त 2025 – हमेशा बुलबुले उड़ाना

पेरिस समिट के बाद यूरोप में एआई को लेकर जो उत्साह था, वह अब धीरे-धीरे ठंडा पड़ चुका है। समिट भले ही काफी नाटकीय और रोमांचक रही हो, लेकिन उसके बाद के महीने बेहद धीमे, जटिल और चकाचौंध से दूर रहने वाली नीति-निर्माण से भरे रहे। पूरे महाद्वीप के लिए एक मजबूत एआई पारिस्थितिकी तंत्र तैयार करने के लिए सिर्फ़ कागज़ी घोषणाएँ काफ़ी नहीं होतीं; इसके लिए टैलेंट, कैपिटल और एनर्जी सप्लाई जैसे बुनियादी संसाधनों के साथ-साथ उन्हें आपस में जोड़ने की गहरी तकनीकी समझ और इच्छाशक्ति की भी ज़रूरत होती है। अब यह बात हर किसी के सामने साफ़ हो चुकी है कि वह €200 बिलियन की रकम काफी हद तक सिर्फ एक दिखावा थी, और यही वजह है कि शुरुआती उत्साह का गुब्बारा अब पूरी तरह पिचक चुका है।

दूसरी ओर, अमेरिका में तरक्की की यह रफ़्तार बिल्कुल भी धीमी नहीं पड़ी है। वहाँ टैलेंट को अपने पाले में करने की होड़ और तेज़ हो चुकी है: मेटा, जो एआई की इस रेस में फ्रंटियर से थोड़ा पीछे छूट गया था, अब अपने प्रतिद्वंद्वियों के टॉप रिसर्चर्स को ऐसी भारी-भरकम सैलरी देकर तोड़ रहा है जिसके सामने प्रीमियर लीग के फुटबॉलर्स की कमाई भी फीकी लगने लगे। यहाँ तक कि मार्क ज़करबर्ग उन्हें अपनी कंपनी में लाने के लिए खुद अपने हाथों से सूप बनाकर लुभा रहे हैं। इसी बीच, ट्रंप प्रशासन ने अपनी नेशनल एआई स्ट्रैटेजी जारी कर दी है, जिसका शीर्षक है ‘Winning the Race’(‘दौड़ जीतना’ )। इसमें एआई के ज़रिए आ रहे इस बदलाव को ‘एक साथ औद्योगिक क्रांति, सूचना क्रांति और एक नए पुनर्जागरण (Renaissance) का दौर’करार दिया गया है।

यूरोपीय लोग, जो खुद को अमेरिकियों के मुकाबले ज़्यादा व्यावहारिक और ज़मीनी हकीकत से जुड़ा हुआ मानते हैं, उन्हें यह लफ्फाजी ज़रूरत से ज़्यादा बढ़ा-चढ़ाकर कही गई लगती है और इसे बेचने वाले टेक लीडर्स पर उन्हें ज़रा भी भरोसा नहीं है। कैरोलिन को अब अपने दफ़्तर में हर रोज़ ‘एआई bubble’ शब्द सुनने को मिलता है। उनके सहयोगियों ने पहले भी कई बार टेक दिग्गजों को अपने प्रोडक्ट्स की उपयोगिता का झूठा ढिंढोरा पीटते देखा है। कैरोलिन का एक साथी कहता भी है, “याद है एनएफटी? बंदरों की वे अजीब तस्वीरें जिन्हें लोगों ने $50,000 में खरीदा था?”

क्रिश्चियन: 'बबल' वाली बातें कैसी चल रही हैं वहाँ?
कैरोलिन: हर तरफ यही चर्चा है। कल एक मीटिंग में मेरे डायरेक्टर ने तीन बार इस शब्द का इस्तेमाल किया।
क्रिश्चियन: ज़रा एंथ्रोपिक के रेवेन्यू के आंकड़े सामने आने दो, फिर देखना।
क्रिश्चियन: इस साल वे 9 बिलियन डॉलर का रेवेन्यू छूने वाले हैं।
क्रिश्चियन: जबकि पिछले साल यह आंकड़ा महज़ 1 बिलियन डॉलर के आसपास था।
क्रिश्चियन: यह वाकई में बहुत विशाल ग्रोथ है।
कैरोलिन: ठीक है, मैं मीटिंग में इसका ज़िक्र करूँगी।
क्रिश्चियन: तुम नहीं करोगी, मुझे पता है।

कैरोलिन इसका ज़िक्र करती तो हैं, लेकिन ऑफ़िस में कोई भी इसे सुनकर बहुत प्रभावित नहीं दिखता। कुछ सहकर्मी तुरंत यह दलील देते हैं कि एंथ्रोपिक इतनी बड़ी कमाई के बावजूद अभी तक मुनाफ़ा (Profit) नहीं कमा पा रही है।

मार्केट में जीपीटी-5 के आगमन ने ब्रसेल्स के इस ‘बबल’ वाले नैरेटिव को और ज़्यादा हवा दे दी है। ओपनएआई ने इस मॉडल का ज़ोर-शोर से हाइप बनाया था: सैम ऑल्टमैन ने सोशल मीडिया पर ‘डेथ स्टार’ की एक तस्वीर पोस्ट की थी और कंपनी के कर्मचारी 2025 को ‘एआई agent का साल’ बता रहे थे। लेकिन जब यह मॉडल आम लोगों के सामने आया, तो इसने काफी निराश किया। असल में यह मौजूदा ओ3मॉडल का ही थोड़ा बेहतर और पॉलिश किया हुआ वर्ज़न महसूस हुआ। इसमें अब भी गलत जानकारियाँ देने (Hallucinations/भ्रम) और बेवकूफी भरी गलतियाँ करने की पुरानी समस्या बरकरार थी।

इसे देखकर ब्रसेल्स में एआई पर शक करने वाले गुट को एक बार फिर अपनी जीत का अहसास होने लगा है। “मैंने तो तुमसे पहले ही कहा था कि एआई की तरक्की अब एक दीवार से टकराकर रुक गई है,” कैरोलिन के एक साथी ने प्लेस ड्यू लक्ज़मबर्ग में बीयर का घूंट लेते हुए उससे कहा। हालांकि उसने यह बात काफी दोस्ताना अंदाज़ में कही थी। पिछले कुछ महीनों में, कैरोलिन की पहचान अपनी पूरी यूनिट में एक ‘एआई booster’ (एआई की तरफदार) के रूप में बन चुकी है—एक ऐसा टैग जिसके बारे में वह खुद आश्वस्त नहीं हैं कि वह इसकी हकदार हैं भी या नहीं। वह पूरी तरह अपने साथियों को गलत भी नहीं मान पा रही हैं; वे खुद मानती हैं कि जीपीटी-5 वाकई उम्मीद से कमतर था। हो सकता है कि अमेरिकी सचमुच हवा का रुख बढ़ा-चढ़ाकर दिखा रहे हों। हो सकता है कि ब्रसेल्स की सोच ही सही हो।

इसके विपरीत, कुछ तकनीकी जानकारों का अब भी यह मानना है कि एआई की क्षमताओं के तेज़ी से बढ़ते ग्राफ (Exponential Curve/घातीय वक्र) के लिहाज़ से जीपीटी-5 वैसा ही है जैसी उम्मीद की जानी चाहिए थी; आख़िरकार o3 को आए अभी कुछ ही महीने तो हुए थे। लेकिन यूरोप के एआई आलोचक इन तर्कों को सुनने के लिए तैयार नहीं हैं, क्योंकि ओपनएआई ने ज़रूरत से ज़्यादा वादे करने और फिर उम्मीद के मुताबिक नतीजा न देने की एक बहुत बड़ी मार्केटिंग भूल कर दी थी।

कैरोलिन: तुम जीपीटी-5 के बारे में क्या सोचते हो?
क्रिश्चियन: वह एक गलत कदम था। उन्हें ओ3 को ही इस नाम से बाजार में उतारना चाहिए था।
क्रिश्चियन: लेकिन जो इसकी बुनियादी क्षमता है, वह अब भी आगे बढ़ रही है।
क्रिश्चियन: हम पिछले कुछ महीनों से अपने वर्कफ़्लो में o3 का इस्तेमाल कर रहे हैं और इसके नतीजे सचमुच हैरान करने वाले हैं।

अमेरिका की बड़ी लैब्स में अभी भी पानी की तरह पैसा बह रहा है और विशाल डेटा सेंटर्स बनाने की होड़ जारी है, लेकिन ब्रसेल्स की नज़रों में यह पैसा महज़ एक पिंग-पोंग बॉल की तरह इधर-उधर घूमता हुआ दिखाई देता है। उदाहरण के लिए, ओरेकल और ओपनएआई ने 300 अरब डॉलर की एक बड़ी कंप्यूट डील की, जिसका ज़्यादातर हिस्सा एनवीडिया की चिप्स खरीदने पर खर्च होना है; वहीं दूसरी तरफ, एनवीडिया ने ओपनएआई में 100 अरब डॉलर का निवेश करने पर सहमति जता दी। सैन फ़्रांसिस्को में इन डील्स को इस बात का पुख्ता सबूत माना जाता है कि यह टेक्नोलॉजी पूरी दुनिया को बदलने वाली है और यहाँ पुराने नियम लागू नहीं होते। लेकिन ब्रसेल्स की नज़रों में यह पूरा खेल 2007 के ‘क्रेडिट-डिफ़ॉल्ट स्वैप्स’ जैसा दिखाई देता है: जटिल, गोल-मोल, पूरी तरह से अस्थिर और जिसका अंत बेहद बुरा होने की आशंका है।

यही वजह है कि फ्रांसीसी स्टार्टअप मिस्ट्रल का €1.7 बिलियन का फ़ंड जुटाना—जिसका एक बड़ा हिस्सा डच लिथोग्राफ़ी मशीन निर्माता कंपनी ए.एस.एम.एल से आया है—यूरोप के लिए एक बहुत बड़ी रणनीतिक जीत माना जा रहा है, भले ही यह फंडिंग राउंड ओपनएआई के मुक़ाबले बीस गुना छोटा क्यों न हो। हर तरफ ‘बबल’ की इस गूंज का असर यह हुआ है कि अब बहुत कम यूरोपीय नीति-निर्माता इस बात को लेकर चिंतित हैं कि उनकी एआई कंपनियों के पास फ़ंड की कमी है। उनकी सोच साफ है: अगर एआई और ये बड़े-बड़े निवेश सिर्फ एक बढ़ा-चढ़ाकर दिखाया गया हाइप हैं, तो फिर इस अंधी दौड़ में जल्दबाज़ी करने की कोई ज़रूरत ही नहीं है।

नवंबर 2025 – ज़मीन-आसमान का फ़र्क

नवंबर में, एंथ्रोपिक ने क्लॉड ओपस 4.5 रिलीज़ किया। न तो कोई ‘डेथ स्टार’ ट्वीट आया, न ही कोई काउंटडाउन हुआ और न ही कोई इवेंट। यह मॉडल अच्छा है – ज़्यादातर लोगों के हिसाब से जीपीटी-5 से भी बेहतर – लेकिन 2025 के स्टैंडर्ड के हिसाब से इसकी रिलीज़ में कोई खास ड्रामा नहीं था।

दिलचस्प बात यह है कि लोग इसका इस्तेमाल कैसे करने लगते हैं।

एआई एजेंट्स के क्षेत्र में एक बड़ी कामयाबी मिली है, लेकिन यह वैसी नहीं है जैसा लोगों ने सोचा था। शुरुआत में, वसंत और गर्मियों के दौरान, बड़ी लैब्स ने कई ऐसे प्रोडक्ट्स जारी किए थे जो सीधे आपके कंप्यूटर को कंट्रोल करते थे। वे आपका माउस हिलाते, वेब फ़ॉर्म भरते और बुकिंग प्रोसेस में क्लिक करते थे। सुनने में तो यह अच्छा लगता था, लेकिन असल में ज़्यादातर मामलों में ये काम नहीं करते थे। जिन लोगों ने इन्हें आज़माया, उनमें से कई लोगों का यही मानना था कि एआई एजेंट अभी पूरी तरह तैयार नहीं हैं।

अब पता चला है कि कोड लिखने वाले एजेंट्स वाकई काम करते हैं। एंथ्रोपिक का क्लॉड Code – जो एक टर्मिनल-बेस्ड टूल है और नए ओपस 4.5 के साथ मिलकर काम करता है – इस साल का सरप्राइज़ हिट साबित हुआ है। क्रिश्चियन के दोस्त की बात सही थी: जब जनवरी का महीना आता है, तो हेज़ वैली में सॉफ़्टवेयर की ज़्यादातर लाइनें सचमुच एआई ही लिखता है। डेवलपर्स को जल्द ही यह समझ आ जाता है कि कोड ही यूनिवर्सल इंटरफ़ेस है: अगर आप कोड लिख सकते हैं, तो आप वह सब कुछ कर सकते हैं जो कंप्यूटर कर सकता है। ईमेल भेजना है? जीमेल में नेविगेट करने के बजाय, क्लॉड कोड से एक स्क्रिप्ट(संकेत-लिपि ) लिखें। डॉक्यूमेंट्स को ऑर्गनाइज़ करना है? क्लॉड कोड से एक स्क्रिप्ट लिखें।

सैन फ़्रांसिस्को में यह आम बात हो गई। लोग क्लॉड कोड मेनिया की बातें करने लगे। डेवलपर्स हर महीने टोकन पर हज़ारों डॉलर खर्च करने लगे; वे रात में ही क्लाउड के लिए ऐसे काम कतार में लगा देते थे जिन्हें वह सुबह तक पूरा कर सके, और ऐसा किए बिना वे सोते नहीं थे। उनका मानना था—और सही भी था—कि उन्हें इस सौदे में फ़ायदा हो रहा है: इससे प्रोडक्टिविटी में ज़बरदस्त बढ़ोतरी हो रही थी। एंथ्रोपिक इतिहास की सबसे तेज़ी से बढ़ने वाली कंपनी बन गई।

क्रिश्चियन: हमारा ज़्यादातर कोड अब क्लाउड लिखता है।
क्रिश्चियन: मेरा मतलब सिर्फ़ मदद से नहीं है, मेरा मतलब है कि पूरा कोड उसने खुद लिखा है।
क्रिश्चियन: मेरे इंजीनियर इसे जूनियर टीम की तरह संभाल रहे हैं।
क्रिश्चियन: बस फ़र्क इतना है कि यह कभी सोता नहीं है
कैरोलिन: क्या यह आपके इंजीनियरों के लिए अच्छा है?
क्रिश्चियन: अभी के लिए तो हाँ।
क्रिश्चियन: प्रोडक्टिविटी में ज़बरदस्त बढ़ोतरी हुई है।
क्रिश्चियन: लैब इसका आंतरिक रूप से उपयोग कर रही हैं और तेज़ी से उनकी प्रगति हो रही है।
क्रिश्चियन: वाकई काफ़ी तेज़ी से।
क्रिश्चियन: और अब वे हर तीन महीने में एक नया वर्ज़न जारी कर रहे हैं।
क्रिश्चियन: पहले हर छह महीने में होता था।

कैरोलिन काम पर जाते समय मेट्रो में मैसेज पढ़ती हैं। जब तक वह अपनी डेस्क पर पहुँचती हैं, तब तक वह अपनी यूनिट की सुबह की मीटिंग में इस मुद्दे को उठाने का फ़ैसला कर चुकी होती हैं।

लेकिन मीटिंग में बात ठीक से आगे नहीं बढ़ पाती। वह प्रोडक्टिविटी में बढ़ोतरी, नए रेवेन्यू के आंकड़े, छोटे रिलीज़ साइकल्स और अपने आगामी मॉडल्स तैयार करने के लिए खुद के एआई का इस्तेमाल करने वाली लैब्स के बारे में बताती हैं। कमरे में मौजूद लोग शालीनता से पेश आते हैं, लेकिन उनके चेहरे का अविश्वास साफ़ झलकता है। कोई पूछता है कि क्या उनके पास ऐसी पीयर-रिव्यूड (समकक्ष-समीक्षित) स्टडीज़ हैं जो प्रोडक्टिविटी में हुई इस बढ़ोतरी को साबित करती हों? कोई और धीरे से कहता है कि कंज्यूमर-ग्रेड एआई एजेंट्स पूरे साल निराशाजनक ही रहे हैं। कैरोलिन पलटकर तर्क देती हैं कि कंज्यूमर एजेंट्स मुख्य बात नहीं हैं; असल बात तो मॉडल्स की खुद को बेहतर बनाने की अंदरूनी क्षमता है। इसके बाद बातचीत का रुख किसी दूसरे विषय की तरफ मुड़ जाता है।

वैसे भी, संस्था की आंतरिक पॉलिसी के तहत कर्मचारियों को काम के डिवाइसेस पर क्लॉड या चैटजीपीटी का इस्तेमाल करने से पूरी तरह रोक दिया गया है। अमेरिका के इन अलग-अलग एआई टूल्स को डेटा-सुरक्षा के लिए एक बड़ा जोखिम माना जाता है। इसके विकल्प के रूप में कमीशन अपने कर्मचारियों को अपना खुद का ‘जीपीटी’ देता है, जो असल में कुछ पुराने और छोटे ओपन-सोर्स मॉडल्स पर आधारित महज़ एक रैपर (wrapper) है। विडंबना यह है कि जो कर्मचारी फ्रंटियर एआई सिस्टम्स को रेगुलेट करने के लिए नियुक्त किए गए हैं, वे खुद अपनी रोज़मर्रा की ड्यूटी में इनका इस्तेमाल तक नहीं कर सकते।

अपने साथियों की इस ज़िद से बेहद परेशान होकर वह अपने ऑफ़िस लौटती हैं और यह याद करने की कोशिश करती हैं कि आख़िर वह कौन सा मोड़ था, जब उन्होंने खुद एआई की क्षमताओं को लेकर शक करना छोड़ दिया था।

फ़रवरी 2026 – दो मोर्चों पर जंग

असलियत में, 2026 की पहली छमाही यूरोप के लिए एआई पॉलिसी पर सोच-समझकर आगे बढ़ने का सही समय नहीं है। बहुत कुछ हो रहा है। जनवरी में, अमेरिकी स्पेशल फोर्सेज़ काराकास में रेड करती हैं और निकोलस मादुरो को अगवा कर लेती हैं। कुछ दिनों बाद, ट्रंप ग्रीनलैंड पर हमला करने की धमकी देते हैं। फरवरी में, अमेरिका और इज़राइल ईरान पर बमबारी करते हैं। तेल की कीमतें बढ़ जाती हैं। ट्रंप धमकी देते हैं कि अगर यूरोपीय सहयोगी होर्मुज़ जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) को फिर से खोलने में मदद के लिए जहाज़ नहीं भेजते हैं, तो वे नाटो छोड़ देंगे।

इसके बाद, डिपार्टमेंट ऑफ़ वॉर (युद्ध विभाग एंथ्रोपिक के साथ युद्ध में उतरता है।

यह अनबन एक कॉन्ट्रैक्ट विवाद की वजह से हुई है। एंथ्रोपिक ने अपने मॉडल DoW को लीज़ पर दिए थे और समय के साथ ये मॉडल उनके मिलिट्री ऑपरेशन के लिए बहुत ज़रूरी हो गए हैं, जिनमें वेनेज़ुएला में होने वाले ऑपरेशन भी शामिल हैं। कॉन्ट्रैक्ट में दो कड़ी शर्तें तय की गई थीं: क्लॉड का इस्तेमाल अभी पूरी तरह से खुद काम करने वाले (फ़ुल ऑटोनॉमस) घातक हथियारों के लिए नहीं किया जा सकता, और न ही इसका इस्तेमाल अमेरिकी नागरिकों की बड़े पैमाने पर निगरानी के लिए किया जा सकता है। कहा जाता है कि एंथ्रोपिक शुरू से ही इन शर्तों पर ज़ोर देता रहा है।

अब पेंटागन उन शर्तों पर फिर से बातचीत करना चाहता है, और जब एंथ्रोपिक मना कर देता है, तो विवाद तेज़ी से बढ़ जाता है। पहले तो DoW, ‘डिफ़ेंस प्रोडक्शन एक्ट’ के ज़रिए एंथ्रोपिक को बिना किसी रोक-टोक के एक्सेस देने के लिए मजबूर करने की धमकी देता है; फिर वह इसके उलट काम करता है - वह कंपनी को ‘सप्लाई चेन रिस्क’ (आपूर्ति श्रृंखला के लिए जोखिम) घोषित कर देता है। यह दर्जा आमतौर पर उन कंपनियों को दिया जाता है जिन्हें सरकार दुश्मन विदेशी ताकतों के प्रभाव में मानती है। जैसा कि सेक्रेटरी ऑफ़ वॉर ने कहा, इस दर्जे की वजह से पेंटागन के साथ काम करने वाली कोई भी दूसरी फ़र्म एंथ्रोपिक के साथ कारोबार नहीं कर सकती, जिससे कंपनी असल में बर्बाद हो जाएगी - क्योंकि एंथ्रोपिक के सभी कंप्यूट प्रोवाइडर DoW के साथ काम करते हैं।

कैरोलिन: एंथ्रोपिक को यूरोपीय संघ में लाने के लिए क्या करना होगा?
क्रिश्चियन: वे ऐसा नहीं करेंगे।
क्रिश्चियन: वे देशभक्त हैं। वे चाहते हैं कि अमेरिका जीते।
क्रिश्चियन: आप कॉपीराइट नियमों और लेबर प्रोटेक्शन (मज़दूरों की सुरक्षा) को हटाने की कोशिश कर सकते हैं।
क्रिश्चियन: डेटासेंटर की मंज़ूरी की प्रक्रिया को ठीक करें। बड़े पैमाने पर निर्माण करें। टैक्स में छूट दें।
कैरोलिन: यह काम नहीं करेगा। हम सिलिकॉन वैली नहीं हैं।
क्रिश्चियन: आप कम से कम उनके लिए यूरोप में विस्तार करना ज़्यादा आकर्षक तो बना ही सकते हैं।
कैरोलिन: यहाँ लोगों को चिंता है कि वे लंदन चले जाएँगे।
क्रिश्चियन: इसमें बुराई क्या है?

कैरोलिन लगातार खबरें देख रही है। सारी बातें मिलकर एक बुरा संकेत दे रही हैं। अमेरिकी सरकार को एआई की अहमियत समझ आ गई है, और अब वह उस कंपनी को खत्म करने की कोशिश कर रही है जो इसे बना रही है, क्योंकि सरकार उस पर काबू नहीं कर पा रही है। ब्रसेल्स में सरकारी कर्मचारियों पर मेमो लिखने के लिए एडवांस्ड एआई टूल्स का इस्तेमाल करने पर रोक है; वहीं वॉशिंगटन में, इन्हीं टूल्स का इस्तेमाल मिलिट्री ऑपरेशन की योजना बनाने के लिए किया जा रहा है।

एंथ्रोपिक को सप्लाई-चेन रिस्क डेज़िग्नेशन के खिलाफ़ शुरुआती रोक का आदेश मिल गया है, लेकिन कंपनी और सरकार के बीच रिश्ते अब तनावपूर्ण हो गए हैं।

मार्च 2026 – जंगली सरहद

पिछले साल नवंबर में, फ्रांस, जर्मनी और यूरोपियन कमीशन ने ‘फ्रंटियर एआई इनिशिएटिव’ का ऐलान किया था। इस प्लान का मकसद 2026 की पहली तिमाही के आखिर तक दुनिया का सबसे ज़्यादा फ़ंड वाला नॉन-प्रॉफिट एआई रिसर्च ऑर्गनाइज़ेशन बनाना था। ऐलान में कहा गया कि यूरोप के पास ज़रूरी टैलेंट और डेटा है, और वह अपनी गीगा-फ़ैक्ट्रियों के ज़रिए कंप्यूट क्षमता भी बना रहा है। बस कमी इस बात की है कि इन फ़ायदों को एक साथ लाने के लिए कोई पहल नहीं की गई है। इस मामले से जुड़े लोग इसे लेकर उत्साहित थे।

लेकिन जब पहली तिमाही खत्म होती है, तो कोई नॉन-प्रॉफिट संस्था नहीं होती। वर्ल्ड-क्लास रिसर्च इंस्टीट्यूट बनाना मुश्किल है, खासकर तब जब आप एक के बाद एक जियोपॉलिटिकल संकटों से जूझ रहे हों। एक और मुश्किल बात यह है कि इस पहल के लिए सलाह देने वाले लोग बहुत अलग-अलग तरह की सलाह देते हैं: कुछ का कहना है कि AGI तक पहुँचने के मामले में एलएलएम एक डेड-एंड (बेकार रास्ता) हैं और नॉन-प्रॉफिट संस्था को कोई नया तरीका खोजना चाहिए। वहीं कुछ लोग किसी खास क्षेत्र पर ध्यान देना चाहते हैं, जैसे साइंस के लिए एआई या इंडस्ट्री के लिए AI। कुछ और लोग क्वांटम-कंप्यूटिंग वाले भविष्य की तैयारी के बारे में बात करते हैं। जिन लोगों से कमीशन ने सलाह-मशविरा करने का फ़ैसला किया है, उनके बीच कोई आम सहमति नहीं बन पाई है।

पैसे की भी कमी है। फ्रांस पर भारी कर्ज का बोझ है; यूरोपियन कमीशन का नया बजट चक्र अभी दो साल दूर है; जर्मनी के पास पैसा तो है, लेकिन उसने यूरोप की सबसे मज़बूत पारंपरिक सेना बनाने पर सहमति जताई है।

अगर ‘फ्रंटियर एआई इनिशिएटिव’ को अच्छी फंडिंग नहीं मिलती है, तो यह US की लैब्स से मुकाबला करने लायक कंप्यूटिंग पावर या सैलरी पैकेज नहीं दे पाएगा, जिससे दुनिया के बेहतरीन टैलेंट को हायर करना मुश्किल होगा। बेहतरीन टैलेंट के बिना और ज़्यादा फ़ंड जुटाना भी मुश्किल है। ऐसी चर्चा है कि ‘फ्रंटियर एआई इनिशिएटिव’ यूरोप की टेक महत्वाकांक्षाओं से जुड़ी एक जानी-पहचानी उलझन में फंसा हुआ है: संस्थान तब तक कोई कमिटमेंट करने से हिचकिचाते हैं जब तक कि प्रोजेक्ट सफल न हो जाए, और बिना कमिटमेंट के यह सफल हो नहीं सकता।

मार्च में, ओपनएआई ने एक ही राउंड में 122 अरब डॉलर जुटाए।

कैरोलिन: क्या आप किसी ऐसे व्यक्ति को जानते हैं जो 'फ्रंटियर इनिशिएटिव' के लिए अच्छा लीड हो सकता है?
क्रिश्चियन: ब्रसेल्स वाली सैलरी पर?
कैरोलिन: कुछ लोग अपवाद के लिए तैयार दिखते हैं।
क्रिश्चियन: मुझे आस-पास पूछने दो।
क्रिश्चियन: आपको पता है न कि यह तभी काम करेगा जब आप सारी कागज़ी कार्रवाई और नियम-कानून की अड़चनें हटा देंगे?
क्रिश्चियन: जैसे यू.के. ने किया था।
क्रिश्चियन: वैसे, क्या आपने ओपनएआई का आंकड़ा देखा?
कैरोलिन: हाँ।
क्रिश्चियन: यह यूरोप की सभी एआई कंपनियों द्वारा अब तक जुटाई गई कुल रकम से भी ज़्यादा है।
क्रिश्चियन: एक ही राउंड में।

अप्रैल 2026 – माइथॉस

एंथ्रोपिक ने अब तक का सबसे सक्षम एआई मॉडल, क्लॉड माइथॉस पेश किया है।

एंथ्रोपिक की इंटरनल टेस्टिंग से पता चला है कि यह मॉडल कोडिंग और सिक्योरिटी रिसर्च में इतना माहिर है कि इसने सभी बड़े ऑपरेटिंग सिस्टम और वेब ब्राउज़र में हज़ारों ऐसी खामियों का पता लगाने में मदद की है, जिनके बारे में पहले किसी को पता नहीं था। इनमें से कुछ खामियां तो दशकों पुरानी थीं और उन कोडबेस में बिना पता चले मौजूद थीं, जिन्हें कई सालों तक हज़ारों डेवलपर्स और सिक्योरिटी रिसर्चर्स ने रिव्यू किया था। लेकिन माइथॉस ने कुछ ही हफ़्तों में इनका पता लगा लिया।

लगभग रातों-रात, एंथ्रोपिक दुनिया की सबसे काबिल साइबर संस्थाओं में से एक बन गई है। इसने तय किया है कि माइथॉस को तब तक जारी नहीं किया जाएगा, जब तक साइबर सुरक्षा करने वालों को अपने सॉफ़्टवेयर की बची हुई कमियों को ठीक करने का मौका न मिल जाए।

कंपनी ने ‘प्रोजेक्ट ग्लासविंग’ लॉन्च किया है। यह एक डिफेंसिव गठबंधन है जोए.डब्ल्यू.एस., एप्पल, गूगल, माइक्रोसॉफ्ट, एनवीडिया और क्राउडस्ट्राइक जैसे चुनिंदा पार्टनर्स के ग्रुप को माइथॉस का खास एक्सेस देता है, ताकि वे विरोधिओं के गलत फ़ायदा उठाने से पहले कमियों का पता लगा सकें। इसका मकसद अमेरिकी सॉफ़्टवेयर इंफ्रास्ट्रक्चर को सुरक्षित बनाना है, इससे पहले कि ओपन मॉडल भी हमले की वैसी ही क्षमता हासिल कर लें; एंथ्रोपिक का अनुमान है कि ऐसा होने में छह से बारह महीने का समय लगेगा।

यूनाइटेड किंगडम के एआई सिक्योरिटी इंस्टीट्यूट - सरकार में एआई की अत्याधुनिक विशेषज्ञता विकसित करने वालों को टेस्टिंग के लिए आमंत्रित किया गया है, लेकिन किसी भी यूरोपीय कंपनी या सरकार को इसका एक्सेस नहीं दिया गया है।

क्रिश्चियन: मुझे लगता है कि आपने ग्लासविंग के बारे में सुना होगा।
कैरोलिन: हाँ।
क्रिश्चियन: इसमें यूरोप की एक भी कंपनी शामिल नहीं है।
कैरोलिन: मुझे पता है।
क्रिश्चियन: अमेरिका की एआई क्षमताओं के मुकाबले पूरे यूरोप का सॉफ़्टवेयर सिस्टम असुरक्षित हो जाएगा।
क्रिश्चियन: क्या ब्रसेल्स में किसी को सच में समझ आता है कि इसका क्या मतलब है?

कई यूरोपियन लोगों को शक है कि क्‍या माइथॉस उतना ही असरदार है जितना दावा किया जा रहा है। कैफ़ेटेरिया में कैरोलिन के बगल वाली टेबल पर बैठे यूरोपियन कमीशन के एग्रीकल्चर लॉयर ने मज़ाक उड़ाते हुए कहा, “वे अपने प्रोडक्ट्स का बढ़ा-चढ़ाकर प्रचार कर रहे हैं।“अरे नहीं, हमने तो न्यूक्लियर हथियार बना लिया है। लेकिन चिंता न करें, हम आपको बम शेल्टर बेच सकते हैं!’ जब कैरोलिन ने आपत्ति जताई, तो वकील ने कहा कि अगर एंथ्रोपिक अपना मॉडल जारी नहीं करता है, तो उनके दावों की पुष्टि करना असंभव है। ‘कितनी सुविधाजनक बात है!’

कैरोलिन अपनी झुंझलाहट को मुश्किल से ही रोक पा रही है। अगर यह सब एक स्कैम है, तो ये बड़ी कंपनियाँ ‘प्रोजेक्ट ग्लासविंग’ से सबके सामने क्यों जुड़ेंगी? Mozilla ने इस महीने आम तौर के मुकाबले बीस गुना ज़्यादा कमियाँ कैसे पता लगाईं? वह रात भर जागकर ‘ग्लासविंग’ से यूरोप के बाहर रहने के रणनीतिक असर पर एक मेमो लिखती है और अपने डायरेक्टर के साथ एक इमरजेंसी ब्रीफिंग का समय ले लेती है, जो उसकी बात को समझने के लिए ज़्यादा तैयार दिखते हैं।

अगले कुछ हफ़्तों में, यूरोपीय संघऔर सदस्य देशों की सरकारें एंथ्रोपिक से उन्हें एक्सेस देने का आग्रह करती हैं - नेताओं को पता होता है कि राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा क्या है। एंथ्रोपिक सावधानी बरतती है लेकिन बातचीत के लिए तैयार रहती है। लेकिन जब कंपनी आखिरकार घोषणा करती है कि वह माइथॉस का एक्सेस सत्तर और संगठनों को देना चाहती है - जिनमें से कई यूरोपीय हैं - तो व्हाइट हाउस आपत्ति जताता है। उनका कहना है कि यह सुरक्षित नहीं है। इसके अलावा, एंथ्रोपिक की कंप्यूटिंग क्षमता सीमित है; ज़्यादा पार्टनर का मतलब है अमेरिकी सरकार के काम के लिए कम क्षमता।

एक महीने पहले, अमेरिकी प्रशासन एंथ्रोपिक को पूरी तरह खत्म करना चाहता था। अब वह चाहता है कि कंपनी का सबसे ताकतवर मॉडल ज़्यादातर उसके ही पास रहे। उसे एक ऐसा तरीका मिल गया है जिससे एजेंसियां ग्लासविंग के ज़रिए माइथॉस का इस्तेमाल कर सकें, जबकि सप्लाई चेन से जुड़ा नियम तकनीकी रूप से अभी भी लागू है। अचानक, व्हाइट हाउस को लगता है कि वह एंथ्रोपिक के साथ काम कर सकता है। राष्ट्रपति अभी भी एंथ्रोपिक को वोक कहते हैं, लेकिन अब उसे ‘बहुत स्मार्ट’ भी मानते हैं।

जून 2026 – मोहभंग

अठारह महीने के इंतज़ार के बाद, डीपसीक ने अपना अगला मॉडल, V4 जारी किया है। कंपनी के सीमित संसाधनों को देखते हुए यह प्रभावशाली है, लेकिन फिर भी यह अमेरिकी फ्रंटियर से कम से कम छह महीने पीछे है। डीपसीक मानती है कि उसके पास इस मॉडल को बड़े पैमाने पर उपलब्ध कराने के लिए ज़रूरी कंप्यूट पावर की कमी है। जिस कंपनी ने कुछ समय के लिए यूरोप को यह यकीन दिला दिया था कि कंप्यूट पावर मायने नहीं रखती, वह आज भी कंप्यूट पावर की कमी से जूझ रही है।

चीन के मुकाबले यूरोप की हालत और भी खराब है। मिस्ट्रल और पीछे रह गई है। कंपनी ने और €830 मिलियन जुटाए हैं, लेकिन यह राउंड ओपनएआई के हालिया राउंड से 150 गुना छोटा है। और पैसे की ज़रूरत के कारण, मिस्ट्रल ने अमेरिकी निवेशकों से बातचीत शुरू कर दी है। ऐसी चर्चा है कि एलन मस्क की रॉकेट और एआई कंपनी, स्पेसएक्स, इसे खरीदने पर विचार कर रही है।

क्रिश्चियन: हो सकता है कि मिस्ट्रल को सच में स्पेसएक्स खरीद ले।
कैरोलिन: फ़्रांसीसी सरकार ऐसा कभी नहीं होने देगी।
क्रिश्चियन: लेकिन उन्हें बहुत ज़्यादा कंप्यूटिंग पावर और कैपिटल की ज़रूरत है।
क्रिश्चियन: मुझे लगता है कि या तो वे इसे बेच देंगे या फिर कंसल्टिंग पर अपना फ़ोकस बनाए रखेंगे।
क्रिश्चियन: किसी भी हाल में, यह यूरोप के फ्रंटियर एआई का अंत होगा।
क्रिश्चियन: बस यही है। इसके अलावा और कोई विकल्प नहीं है।

इंफ्रास्ट्रक्चर की स्थिति भी उतनी ही खराब है। अमेरिका का सबसे बड़ा एआई सुपरकंप्यूटर 1,250मेगावाट पर चलता है। यूरोप का सबसे बड़ा सुपरकंप्यूटर 83 मेगावाट पर चलता है। ‘गीगाफैक्ट्री’ का प्लान तय समय से काफी पीछे चल रहा है और इसके शुरू होने की उम्मीद अब 2029 तक टल गई है। बजट की कमी के कारण इसकी योजना का दायरा छोटा करना पड़ेगा। अगर कल अचानक आसमान से कोई पूरी तरह तैयार गीगाफैक्ट्री भी आ जाए, तो भी वह अमेरिका के सबसे बड़े एआई डेटा सेंटर के आकार का दसवां हिस्सा ही होगी। दुनिया की कुल एआई कंप्यूटिंग क्षमता का सिर्फ़ पांच प्रतिशत हिस्सा यूरोप में है, जबकि अमेरिका में यह 80 प्रतिशत है।

हाँ, कुछ अच्छी खबरें भी हैं: सॉफ्टबैंक – वही कंपनी जो प्रेसिडेंट ट्रंप के साथ मंच पर मौजूद थी – ने फ्रांस में एआई डेटा सेंटर की क्षमता बढ़ाने के लिए अगले पाँच सालों में 45 अरब डॉलर का निवेश करने का वादा किया है। लेकिन कैरोलिन ने ऐसे वादों पर पूरी तरह भरोसा न करने का सबक सीख लिया है। Fluidstack, एक क्लाउड प्रोवाइडर जिसने पेरिस के पास गीगावाट-स्केल का डेटा सेंटर बनाने की योजना बनाई थी, ने हाल ही में यह विचार छोड़ दिया और, जले पर नमक छिड़कते हुए, अपना हेडक्वार्टर लंदन से अमेरिका शिफ्ट कर लिया। इसी तरह, रेगुलेटरी अड़चनों का हवाला देते हुए ओपनएआई ने भी UK में एक बड़ा डेटा सेंटर बनाने की अपनी योजना से कदम पीछे खींच लिए।

जब जून में यूरोपीय संघने अपने लंबे समय से प्रतीक्षित ‘टेक सॉवरेनिटी पैकेज’ (तकनीकी आत्मनिर्भरता पैकेज) की घोषणा की, तो कैरोलिन को इसके प्रचार-प्रसार को लेकर मिली-जुली भावनाएँ महसूस हुईं। एक तरफ तो समस्या की पहचान सही थी: यूरोप वास्तव में अमेरिकी तकनीक पर बहुत ज़्यादा निर्भर हो गया है। उनके सुझाए गए समाधानों में से एक को इस पैकेज में भी शामिल किया गया है—यह समाधान ऐसे खास ज़ोन बनाने का प्रस्ताव है जहाँ कंपनियाँ तेज़ी से एआई डेटा सेंटर बना सकें। दूसरी तरफ़, ये आंकड़े एक दूसरे से मेल नहीं खाते। यूरोपीय संघका लक्ष्य 2036 तक एआई डेटा सेंटरों के लिए €200 बिलियन की प्राइवेट कैपिटल जुटाना है - यह उस रकम का एक-चौथाई है जो अमेरिकी हाइपरस्केलर सिर्फ़ 2026 में ही खर्च कर रहे हैं। जब वह अपने दोस्त को यह स्थिति समझाती है, तो वह कहता है: ‘तो तुम एक ऐसे दस साल के प्रोग्राम का प्रस्ताव रख रही हो जो उनके तिमाही कैपिटल खर्च के बराबर है, और इसे एक ऐतिहासिक लामबंदी कह रही हो?’

लंबी बातचीत के बाद, यूरोप के कुछ खास लोगों को अब माइथॉस का एक्सेस देने का वादा किया गया है। लेकिन जहाँ कानूनी विभाग अभी भी कॉन्ट्रैक्ट की बारीकियों पर काम कर रहे हैं, वहीं एंथ्रोपिक पहले से ही माइथॉस 2.0’ को ट्रेन कर रहा है। इससे भी बुरी बात यह है कि अमेरिकी राष्ट्रपति ने हाल ही में एक एग्जीक्यूटिव ऑर्डर (EO) पर साइन किया है। इसमें फ्रंटियर एआई कंपनियों से कहा गया है कि वे ‘अपनी मर्ज़ी से’ अमेरिकी सरकार को अपने मॉडल्स की साइबर जोखिमों के लिए जांच करने दें। साथ ही, यह ऑर्डर सरकारी एजेंसियों को पब्लिक में रिलीज़ होने से पहले ही उन मॉडल्स का एक्सेस देता है। इस राष्ट्रीय सुरक्षा समीक्षा की ज़्यादा जानकारी तो नहीं है, लेकिन इसका ढांचा काफी साफ़ है। कोई भी मॉडल जो इतना शक्तिशाली हो कि मायने रखे – EO की भाषा में ‘कवर्ड फ्रंटियर मॉडल’ – उसे अब सबसे पहले वॉशिंगटन से गुज़रना होगा: रिलीज़ से पहले सरकार को तीस दिनों तक खास फेडरल एक्सेस मिलेगा, और सरकार यह भी तय करेगी कि पूरी तरह पब्लिक में रिलीज़ होने से पहले कौन से ‘भरोसेमंद पार्टनर’ उस मॉडल का इस्तेमाल कर सकते हैं।

कैरोलिन इसे दो बार पढ़ती है। तीस दिन की समय-सीमा से निपटा जा सकता है, लेकिन पार्टनर चुनने की शक्ति का मतलब है कि जब मॉडल ‘ओपन फ्रंटियर’ से आगे होगा, तो उसे कौन हासिल करेगा, यह फ़ैसला अब वॉशिंगटन में एक गुप्त प्रक्रिया के ज़रिए लिया जाएगा, और इस बात की कोई खास वजह नहीं है कि लिस्ट में किसी यूरोपीय का नाम शामिल किया जाए।

क्रिश्चियन: क्या तुमने एग्जीक्यूटिव ऑर्डर देखा?
क्रिश्चियन: यह ग्लासविंग जैसा ही है, लेकिन अब से हर नेक्स्ट-जेन मॉडल के लिए।
क्रिश्चियन: इसमें सहयोगियों के बारे में कोई क्लॉज़ नहीं है। एक भी नहीं।
कैरोलिन: मुझे पता है।
क्रिश्चियन: तो यूरोप को फ्रंटियर मॉडल का एक्सेस जल्दी मिलेगा या नहीं?
क्रिश्चियन: यह अब एन.एस.ए का फ़ैसला होगा।
क्रिश्चियन: हर तीन महीने में, हमेशा के लिए।

इस बीच, एंथ्रोपिक और ओपनएआई के रेवेन्यू में तेज़ी से बढ़ोतरी हो रही है; एंथ्रोपिक साल के आखिर तक $100 बिलियन सालाना रेवेन्यू के स्तर तक पहुँचने की राह पर है और तेज़ी से बढ़ते कस्टमर बेस को सेवा देने के लिए उसने इमरजेंसी कंप्यूट डील की हैं। एआई लैब्स में, अब हर महीने या उसके आस-पास इंटरनल वर्कफ़्लो बदलते रहते हैं, क्योंकि मॉडल काम करने के नए तरीके लाते हैं। रिसर्चर ऐसे एजेंट्स के ग्रुप को मैनेज करते हैं जो ज़्यादातर कोडिंग का काम संभालते हैं। एआई अपने ही R&D में योगदान दे रहा है, खुद को बेहतर बना रहा है, और इन फ़ायदों का इस्तेमाल करके और भी बेहतर बनने की कोशिश कर रहा है। कुछ महीने पहले, US फ़ेडरल रिज़र्व ने एक रिसर्च जारी की थी जिसमें दिखाया गया था कि जूनियर सॉफ़्टवेयर इंजीनियरों के बीच रोज़गार का स्तर उम्मीद से काफ़ी कम है। सॉफ़्टवेयर कंपनियों के शेयर तेज़ी से गिर रहे हैं, क्योंकि निवेशकों को लगता है कि दमदार कोडिंग एआई मॉडल उनका काम छीन लेंगे।

कैरोलिन को अठारह महीनों से ही इस बात का अंदाज़ा था कि ऐसा होने वाला है, लेकिन वह इसमें कोई खास बदलाव नहीं ला पाईं।

परिदृश्य

अब तक हमने जो कुछ भी कहा है, वह असल में हुआ है – बस कैरोलिन और क्रिश्चियन की निजी कहानियाँ ही काल्पनिक हैं। अब हम आगे की संभावनाओं पर बात करेंगे। हम किसी खास एआई कंपनी का नाम नहीं लेंगे, बल्कि काल्पनिक कंपनियों का ज़िक्र करेंगे: अमेरिका की प्रमुख एआई कंपनी के लिए 'Atlas', यूरोप की प्रमुख कंपनी के लिए 'Helios' और चीन की प्रमुख कंपनी के लिए 'Zimo'।

यूरोपीय संघ के बारह सितारे, जिनमें से आधे पिक्सल की धूल में बिखर रहे हैं।

अगस्त 2026 – दोराहा

फरवरी में, जर्मनी के चांसलर ने चीन का सरकारी दौरा किया था। हांगझोऊ में उन्होंने चीन की EV और रोबोटिक्स फ़ैक्टरियों का दौरा किया। अंदरूनी सूत्रों के मुताबिक, वे वहां से लौटने के बाद काफी गंभीर और सतर्क हो गए थे। उन्हें यह एहसास हुआ कि अगर जर्मन मैन्युफ़ैक्चरर्स ने अपनी रफ़्तार नहीं बढ़ाई, तो वे अपने चीनी प्रतिद्वंदीओं से पीछे रह जाएंगे। अब वे सैन फ़्रांसिस्को की ऐसी ही एक यात्रा की योजना बना रहे हैं। पिछले कुछ महीनों में, जिन लोगों का वे सम्मान करते हैं - जैसे जर्मन बिज़नेस लीडर, अर्थशास्त्री और अमेरिकी बैंकर - उन्होंने उन्हें बताया है कि एआई क्रांति सचमुच हो रही है। वे इसे अपनी आँखों से देखना चाहते हैं। एक इंडस्ट्री डेलिगेशन भी उनके साथ जा रहा है।

चांसलर आसानी से प्रभावित होने वाले व्यक्ति नहीं हैं, लेकिन अपनी यात्रा से लौटने पर वे पहले की तुलना में अधिक शांत थे। उन्हें यह एहसास हो गया है कि यूरोप के प्रभावशाली लोगों ने पिछले अठारह महीनों की स्थिति को गलत समझा है। जब वे इस बात पर बहस कर रहे थे कि क्या एआई की प्रगति रुक जाएगी, तब यह तकनीक उन लोगों की उम्मीदों से भी कहीं ज़्यादा तेज़ी से आगे बढ़ गई, जिन्हें इसके भविष्य पर सबसे ज़्यादा भरोसा था। जब वे एआई के महत्व का आकलन कर रहे थे, तब इसने सॉफ़्टवेयर इंजीनियरिंग और साइबर सुरक्षा के क्षेत्र में क्रांतिकारी बदलाव ला दिए। और जब वे अपनी स्वतंत्र एआई पहलों की तारीफ कर रहे थे, तब अमेरिकी कंपनियों पर उनकी निर्भरता और भी बढ़ती गई।

अगले कुछ दिनों में, वे फ़्रांस के राष्ट्रपति और यूरोपियन कमीशन के प्रेसिडेंट के साथ कई बार लंबी फ़ोन पर बातचीत करते हैं। तीनों को लगता है कि यूरोप एक अहम मोड़ पर पहुँच गया है। एआई और ज़्यादा काबिल होता जाएगा। ऐसा मानने की कोई ठोस वजह नहीं है कि यह इंसानी स्तर पर ही रुक जाएगा। यह लेबर मार्केट, सुरक्षा के ढाँचे और महाद्वीपों के बीच ताकत के संतुलन को बदल देगा। यूरोप दूसरों पर निर्भर है और इसके लिए यूरोप तैयार नहीं है। अगर दिशा बदलनी है, तो अभी बदलनी होगी।

सवाल यह है कि कैसे। उनके टेक्निकल एडवाइज़र चाहते हैं कि डेटा सेंटर प्रोवाइडर्स और हार्डवेयर सप्लाई चेन में शामिल दूसरी कंपनियों को रेगुलेशन के मामले में पूरी छूट दी जाए। उनका कहना है कि जो चीजें दांव पर लगी हुई हैं उनको ध्यान में रखते हुए सिर्फ़ एक बहुत बड़ा कदम ही सही जवाब होगा। एआई एक नई इंडस्ट्रियल क्रांति लाएगा, और अगर यूरोप ने तेज़ी से इंडस्ट्रियलाइज़ेशन नहीं किया, तो वह पीछे रह जाएगा। यूरोप को शांति के समय में अब तक की गई किसी भी कोशिश से कहीं ज़्यादा तेज़ी से आगे बढ़ने की ज़रूरत है।

उनके राजनीतिक सलाहकार उन्हें ज़्यादा संयमित कदम उठाने की सलाह देते हैं और चेतावनी देते हैं कि ऐसे पैकेज के खिलाफ़ जनता के गुस्से से उनकी सरकारें शायद न बच पाएं। लोगों को एआई पसंद नहीं है; फ्रांस, जर्मनी और यूरोपीय संघके सामने कई दूसरी अहम चुनौतियां हैं, और बहुत कम वोटर ही इसकी ज़रूरत को समझ पाएंगे। उनका ‘असरदार जवाब’ कहना शायद राजनीतिक करियर खत्म करने में ही सबसे ज़्यादा असरदार साबित हो।

सितंबर 2026 – एक सकारात्मक दृष्टिकोण

स्ट्रासबर्ग में फ़्रेंच-जर्मन एआई सॉवरेनिटी समिट में, फ़्रांस के राष्ट्रपति और जर्मनी के चांसलर ने संयुक्त रूप से भाषण दिया। यह भाषण उनके राजनीतिक सलाहकारों ने तैयार किया था।

कैरोलिन लिले में अपने घर पर यह सब देख रही हैं। दोनों नेता संकल्प और भविष्य की बात करते हैं। उनका कहना है कि यूरोप अब उनकी भविष्य तय करने वाली टेक्नोलॉजी के लिए दूसरों पर निर्भर नहीं रह सकता; यह सबक वह एनर्जी और डिफेंस के मामले में पहले ही सीख चुका है। इसलिए, यूरोप को अपनी खुद की एडवांस्ड एआई (फ्रंटियर AI) बनानी होगी।

उनका कहना है कि चुनौती बहुत बड़ी है, लेकिन इससे निपटा जा सकता है। इसके लिए निवेश, ऐसे नियम जो अमेरिकी कंपनियों को निष्पक्ष तरीके से काम करने के लिए मजबूर करें, और ऐसे लोगों की ज़रूरत है जो यूरोपीय उत्पाद खरीदें। इस भाषण में बहुत अच्छे नारे हैं।

इसके बाद के हफ्तों में, एआई से जुड़ी घोषणाओं की मानो झड़ी लग जाती है। रणनीति साफ़ होती है-संशय में डूबे लोगों को लगातार नई घोषणाओं की बौछार से निरुत्तर कर देना और भविष्य के प्रति उम्मीद का माहौल तैयार करना। फ्रंटियर एआई पहल को €2अरब की पूंजी के निवेश से मजबूती मिली। चार और गीगा-फ़ैक्टरियों की घोषणा की गई है। एआई को अपनाने के नए प्रोग्राम शुरू किए गए हैं। यूरोपियन कमीशन ने जनरल-परपज़ एआई मॉडल बनाने वाली एक अमेरिकी कंपनी पर एआई एक्ट का पालन न करने का आरोप लगाया है। साथ ही, एआई से बनी गलत जानकारी (डिसइन्फॉर्मेशन) को संभालने के तरीके को लेकर डिजिटल सर्विसेज़ एक्ट के तहत दो ‘सिस्टमिक-रिस्क’ (सिस्टम से जुड़े जोखिम) मामले भी शुरू किए हैं, जिसमें कानून के सबसे व्यापक प्रावधानों का इस्तेमाल किया गया है।

कैरोलिन के साथी कॉफ़ी पीते हुए मुख्य उपाय पर चर्चा करते हैं, जोकि कमीशन के एक प्रस्ताव डिजिटल सॉवरेनिटी रेग्युलेशन (Digital Sovereignty Regulation) के लिए है – जिसे फ़्रांस और जर्मनी का समर्थन प्राप्त है। इसके तहत 2032 तक सार्वजनिक क्षेत्र के महत्वपूर्ण कार्यों (workloads) को 100% यूरोपीय क्लाउड और एआई सॉफ़्टवेयर पर चलाना अनिवार्य होगा। यानी अब अमेरिकी एआई या अमेरिकी क्लाउड का इस्तेमाल नहीं होगा। इसे यूरोपीय जलवायु लक्ष्यों की तर्ज पर तैयार किया गया है और यह एक ऐसी अनिवार्य समय-सीमा तय करेगा जो सभी का ध्यान इस ओर केंद्रित करेगा। साथ ही, यह यूरोपीय सर्विस प्रोवाइडर के लिए भविष्य के ग्राहकों का एक बड़ा और सुनिश्चित आधार भी तैयार करेगा।

इन उपायों को अच्छा रिस्पॉन्स मिला है। अमेरिका से अलग होने के विचार को पसंद किया जा रहा है और जानकार इस कदम को एआई के दौर की इंडस्ट्रियल पॉलिसी बता रहे हैं; आखिरकार यूरोप अपनी टेक्नोलॉजी कंपनियों का साथ दे रहा है। यहाँ तक कि कैरोलिन के जो साथी पहले शक करते थे, वे भी अब मान रहे हैं कि आखिरकार कुछ तो हो रहा है।

कुछ अर्थशास्त्री और टेक पॉलिसी से जुड़े लोग इस पर शक जताते हैं। उनका कहना है कि यूरोप अब मुश्किल फ़ैसलों से नहीं बच सकता। निवेश बहुत कम हैं और उनसे कोई खास फ़ायदा नहीं हो रहा – यूरोप में बड़े पैमाने पर कंप्यूटिंग क्षमता बनाने के लिए बाज़ार में क्या इंसेंटिव हैं? उनका कहना है कि खरीद के लक्ष्य बुनियादी मुद्दों को हल नहीं करते, जैसे कि बिखरा हुआ सिंगल मार्केट, सख़्त लेबर कानून जो स्टार्टअप और एआई को अपनाने में रुकावट डालते हैं, या वे राष्ट्रीय नियम जो हेल्थकेयर और कानूनी सेवाओं जैसे सेक्टर को असल में इनके लिए बंद कर देते हैं। और जहाँ एआई एक्ट के तहत रेगुलेटरी कदम सही ठहराए जा सकते हैं, वहीं डिजिटल सर्विसेज़ एक्ट के तहत उठाए गए कदम कम से कम कुछ हद तक राजनीतिक रूप से प्रेरित लगते हैं। क्या यूरोप को अपनी लड़ाइयाँ ज़्यादा सोच-समझकर नहीं चुननी चाहिए?

लेकिन यूरोप के प्रभावशाली लोग नकारात्मकता से थक चुके हैं, और यह एक सकारात्मक सोच है, एक ऐसा पल है जब सब एकजुट होकर साथ आते हैं। अगर नीति-निर्माताओं को कोई शक भी है, तो उनमें से ज़्यादातर बातें वे ज़ाहिर नहीं करते।

कैरोलिन को निश्चित रूप से संदेह है। उन्हें चिंता है कि एआई सॉवरेनिटी का पूरा पैकेज यह मानकर चलता है कि छह साल बाद भी यूरोप में एक ऐसा अग्रणी एआई सेक्टर होगा जो सुरक्षा के लायक होगा। अगर ऐसा नहीं हुआ तो क्या होगा?

वह इस बात पर ज़ोर देते हुए एक मेमो लिखती है और ऐसे उपाय करने की मांग करती है जिनसे मज़बूत स्थिति बन सके - जैसे कि एक बैकअप प्लान, अगर यूरोप की एआई कंपनी Helios अंतर को कम न कर पाए, या ‘गीगा-फ़ैक्टरी’ उम्मीद के मुताबिक काम न कर पाएं, या ‘यूरोपियन सामान खरीदने’ के नियमों की वजह से सरकारी सेवाओं को अमेरिकी टूल्स के मुकाबले घटिया टूल्स मिलें। उसके डायरेक्टर उस नोट को ध्यान से पढ़ते हैं। वह उससे कहते हैं कि यह एक सोच-समझकर दिया गया सुझाव है। वह इसे आगे के अधिकारियों तक पहुँचाने का वादा करते हैं।

क्रिश्चियन: 2032? 100% सॉवरेन?
क्रिश्चियन: प्लान B क्या है?
कैरोलिन: कोई प्लान B नहीं है।
क्रिश्चियन: ज़ाहिर है, नहीं है।

निजी बातचीत में, जर्मनी की चांसलर और फ्रांस के राष्ट्रपति एक-दूसरे से कहते हैं कि उन्होंने वह सब कुछ किया जो भी मुमकिन था। वे भी एक साथ इतनी सारी राजनीतिक सच्चाइयों को नहीं बदल सकते। सिस्टम इससे ज़्यादा का बोझ नहीं उठा पाता।

जून 2027 – क्लोज़िंग विंडो

अगली गर्मियों में, चीनी लैब Zimo ने’ माइथॉस-क्लास’ एआई मॉडल के वेट्स जारी किए। एंथ्रोपिक ने ‘प्रोजेक्ट ग्लासविंग’ (Project Glasswing) के तहत जिन आक्रामक साइबर क्षमताओं को सुरक्षित रखा था, वे अब किसी के भी लिए उपलब्ध हैं। इनमें से कुछ लोगों के इरादे पूरी तरह नेक नहीं हैं।

इन नई क्षमताओं की वजह से हैकर्स पुराने और कमज़ोर सुरक्षा वाले कमर्शियल सॉफ़्टवेयर को ऐसे तोड़ सकते हैं जैसे कोई चेन-सॉ टिश्यू पेपर को काटता है। यूरोप की यूनिवर्सिटीज़, हॉस्पिटल, क्षेत्रीय सरकारें और कोई भी ऐसा संस्थान जिसने ’ माइथॉस-क्लास’ साइबर-डिफ़ेंस के लिए पैसे नहीं दिए हैं, वे अपने ही सिस्टम से बाहर हो जाते हैं; उनकी स्क्रीन पर क्रिप्टोकरेंसी वॉलेट एड्रेस दिखाई देते हैं और पैसे देने के अलावा कोई दूसरा रास्ता नहीं बचता। सिर्फ़ वे ही बच सकते हैं जो साइबर-डिफ़ेंस के लिए एआई का इस्तेमाल करते हैं, और इसी बात से लोग लैब्स से नाराज़ हैं: उन्होंने ही यह बीमारी फैलाई और अब वे बहुत ज़्यादा कीमत पर इसका इलाज बेच रहे हैं।

यूरोप अपनी सॉवरेनिटी की कोशिशों के असर को सबसे सीधे तरीके से समझ रहा है। ‘डिजिटल सॉवरेनिटी रेग्युलेशन’ (Digital Sovereignty Regulation) अभी-अभी पास हुआ है और कई सदस्य देशों ने समय रहते ही अपनी खरीद-फरोख्त की प्रक्रियाओं में बदलाव करना शुरू कर दिया है। साइबर-सुरक्षा के मामले में, अमेरिका की एआई कंपनी Atlas, यूरोप की एआई कंपनी Helios से बहुत आगे है। जो एजेंसियां ‘बाइ यूरोपियन’ (Buy European) की नीति को सबसे ज्यादा मानने वाली थीं – यानी जिन संगठनों ने सिर्फ़ यूरोपीय कंपनियों से ही सामान खरीदे थे या सर्विस ली थीं – अब वही फिरौती की रकम चुका रही हैं।

जो संगठन अमेरिकी कॉन्ट्रैक्ट को अलग से मानते रहे, वे बेहतर प्रदर्शन कर रहे हैं। लेकिन वे भी दूसरे दर्जे की सुरक्षा व्यवस्था का ही इस्तेमाल कर रहे हैं। एग्जीक्यूटिव ऑर्डर के बाद से, अमेरिकी सरकार अनौपचारिक रूप से हर नए ‘फ्रंटियर मॉडल’ को जारी करने की मंज़ूरी देती है। नतीजा यह है कि सबसे अच्छे अमेरिकी साइबर मॉडल अपने घरेलू बाज़ार में जारी होने के दो से छह महीने बाद यूरोप पहुँचते हैं—तब तक वे ओपन-सोर्स फ्रंटियर के खतरनाक रूप से करीब आ चुके होते हैं और अमेरिकी हैकर्स को उनका एक्सेस मिल चुका होता है। आधिकारिक तौर पर, यह सुरक्षा और निगरानी का मामला है। अनौपचारिक तौर पर, वॉशिंगटन को एक ऐसा एकतरफा फ़ायदा मिला है जिसे वह किसी भी हाल में छोड़ना नहीं चाहता।

कैरोलिन जून का ज़्यादातर समय राष्ट्रीय सरकारों के साथ बातचीत में बिताती हैं। ये बातचीत छोटी और अच्छी नहीं होती हैं।

क्रिश्चियन: ब्रसेल्स रैंसमवेयर की लहर से कैसे निपट रहा है?
कैरोलिन: बहुत बुरे हाल हैं। सॉवरेनिटी की नीतियां मुश्किलें पैदा कर रही हैं।
क्रिश्चियन: क्या विडंबना है।
कैरोलिन: यहां से यह बात मज़ेदार नहीं लगती।
क्रिश्चियन: माफ़ करना। तुम सही कह रही हो।

जैसे-जैसे यूरोप में हालात मुश्किल होते जा रहे हैं, अमेरिका और चीन दोनों ने ही एडवांस्ड एआई मॉडल को ओपन-सोर्स करने पर कड़े प्रतिबंधों का ऐलान किया है। वॉशिंगटन ने राष्ट्रीय सुरक्षा का हवाला देते हुए कहा है कि इससे विरोधी देशों की R&D तेज़ हो सकती है और ऑटोनॉमस साइबर क्षमताएं बढ़ सकती हैं। वहीं, बीजिंग ने सामाजिक स्थिरता और व्यवस्था बनाए रखने की बात कही है। दोनों सरकारें एक बात पर सहमत हैं: एडवांस्ड एआई मॉडल के वेट्स इतने खतरनाक हो गए हैं कि उन्हें किसी को भी नहीं सौंपा जा सकता।

चीनी घोषणा वाली शाम को जब कैरोलिन ऑफिस से बाहर निकलीं, तो उन्होंने अपने आस-पास एक सकारात्मक माहौल देखा। यूरोपीय संघके ‘टेक सॉवरेनिटी पैकेज’ में अमेरिकी एआई के दबदबे का मुकाबला करने के लिए ओपन सोर्स की तारीफ की गई थी। फिर भी, उनके साथी राहत महसूस कर रहे थे। रैंसमवेयर का खतरा कम हो जाएगा। हमले की रफ़्तार स्थिर हो जाएगी; बचाव की क्षमता बेहतर हो जाएगी। उनके साथियों का मानना था कि संकट को काबू में कर लिया गया है। अब बहुत कम लोग इस बारे में सोच रहे थे कि ओपन सोर्स पर प्रतिबंध का यूरोप की बढ़ती निर्भरता पर क्या असर पड़ेगा।

जनवरी 2028 – स्थिति का जायजा लेना

स्ट्रासबर्ग के सोलह महीने बाद, कैरोलिन का प्रमोशन हो गया है और उन्हें दूसरी टीम में भेज दिया गया है।

एआई में तरक्की 2026 की तुलना में भी तेज़ी से हो रही है, ठीक वैसा ही जैसा टेक सी.ई.ओ ने अनुमान लगाया था। अब एजेंट्स स्प्रेडशीट चलाते हैं, सॉफ़्टवेयर डिज़ाइन करते हैं और फाइनेंशियल टूल्स का इस्तेमाल करते हैं। एक मॉडल इमेज बनाता है; दूसरा फोटोशॉप खोलता है और पचास बार बदलाव करता है जब तक कि कंपोज़िशन सही न हो जाए। कैरोलिन एक एजेंट का डेमो देखती है जो एंटरप्राइज़ सॉफ़्टवेयर को इंसानों से दोगुनी रफ़्तार से और बिना कोई गलती किए चलाता है, और उसे यह देखकर अजीब लगता है। अमेरिका की प्रमुख लैब्स एआई रिसर्च को ही ऑटोमेट करने की दिशा में तेज़ी से आगे बढ़ रही हैं; Atlas पब्लिक हो गई है, इसकी मार्केट कैपिटलाइज़ेशन चार ट्रिलियन यूरो तक पहुँच गई है, और अब हर कोई मानता है कि एआई ही अगली बड़ी चीज़ है।

इस दौड़ में शामिल कंपनियों की संख्या भी कम हो गई है - इसकी वजह है बहुत ज़्यादा पूंजी की ज़रूरत और एआई R&D की तेज़ी से बढ़ती रफ़्तार। चौथे और पांचवें स्थान पर मौजूद अमेरिकी एआई कंपनियाँ और भी पीछे छूट गई हैं। एक कंपनी अपनी फ़्रंटियर रिसर्च को किसी बड़ी लैब के साथ साझेदारी में मिलाने पर विचार कर रही है; वहीं दूसरी कंपनी ने एक पैरेलल क्लाउड सर्विस शुरू की है और एआई चिप बनाने की कोशिश कर रही है।

यूरोपीय सॉवरेनिटी की लहर का फ़ायदा उठाते हुए, Helios ने अमेरिकी कंपनियों से लगभग डेढ़ साल पीछे रहते हुए भी अपनी स्थिति मज़बूती से बनाए रखी है। इसने नए यूरोपीय निवेशकों से अरबों डॉलर जुटाए हैं और अपने टैलेंट को कहीं और जाने से रोका है।

रिलेटिव गैप (तुलनात्मक अंतर) में कोई बदलाव नहीं आया है, जिसे एक तरह की जीत माना जा सकता है। लेकिन एब्सोल्यूट गैप (वास्तविक अंतर) की कहानी कुछ और ही है। 2023 में, अठारह महीने एक पीढ़ी के बराबर थे। अब जब क्षमता में तेज़ी से सुधार हो रहा है और नए वर्ज़न लाने का समय (इटरेशन साइकल) कम हो गया है, तो यह कई पीढ़ियों के बराबर हो गया है। और एआई सिस्टम अब सिर्फ़ चैटबॉट नहीं रह गए हैं: वे दवा खोजने के काम में लगे हैं, गणित और साइबर सुरक्षा से जुड़े कामों को ऑटोमेट कर रहे हैं, और कई व्हाइट-कॉलर कर्मचारियों के काम का बड़ा हिस्सा खुद कर रहे हैं।

कैरोलिन का एक पुराना दोस्त, जोकि एक फ़्रेंच रिटेल बैंक में सॉफ़्टवेयर इंजीनियर है, वाइन पीते हुए उसे बताता है कि उसके एम्प्लॉयर की एक सॉवरेन एआई पॉलिसी है। उसे कुछ हद तक Atlas इस्तेमाल करने की इजाज़त है। उसे कोई भी ज़रूरी चीज़ अपलोड करने की इजाज़त नहीं है – यहाँ तक कि डेटासेट में कॉलम के नाम रखने की भी नहीं। वह Helios इस्तेमाल कर सकता है, लेकिन वह और भी खराब है। इसलिए असल में, वह अपने पर्सनल लैपटॉप पर Atlas चलाता है और फ़ाइलों को कॉपी कर लेता है।

ज़्यादातर बड़ी यूरोपीय कंपनियों में यही पैटर्न दोहराया जाता है। सभी जानते हैं कि ऐसा हो रहा है, लेकिन कोई भी इसे खुलकर नहीं कहता।

और फिर भी, ब्रसेल्स के कुछ राजनेताओं ने उम्मीद बनाए रखी है।

‘फ्रंटियर एआई इनिशिएटिव’ ज़ोर-शोर से चल रहा है। फ्रांस और जर्मनी ने इस नॉन-प्रॉफिट संस्था को बहुत ज़्यादा राजनीतिक समर्थन दिया है। उन्होंने अच्छी सैलरी देने का फ़ैसला किया है और बेहतरीन टैलेंट को अपनी टीम में शामिल किया है, जिनमें से कुछ के पास अमेरिकी लैब में काम करने का अनुभव भी है। इस इनिशिएटिव की रिसर्च का एक मुख्य हिस्सा – ‘वर्ल्ड मॉडल्स’ जिनका इस्तेमाल रोबोट को ट्रेन करने के लिए किया जा सकता है – सच में बहुत अच्छे नतीजे दे रहा है और इसे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान मिल रही है।

2028 के यूरोपीय संघबजट ने विज्ञान के क्षेत्र में एआई के लिए काफी नया फ़ंड उपलब्ध कराया है: जैसे कि दवा, मटीरियल और क्लीन एनर्जी, ऐसे क्षेत्र जिनमें यूरोप अभी भी कामयाबी हासिल कर सकता है। शुरुआती मुश्किलों के बाद, अडॉप्शन पायलट प्रोजेक्ट्स से अच्छे नतीजे मिल रहे हैं। डॉक्टर ज़्यादा प्रोडक्टिव हो रहे हैं। टीचर अपने स्टूडेंट्स के बेहतर नतीजों की जानकारी दे रहे हैं।

रोज़गार के संकट की जो चेतावनियाँ दी गई थीं, वे भी अभी तक सच नहीं हुई हैं। जिन सेक्टर में एआई का इस्तेमाल ज़्यादा हो रहा है, वहाँ भी इससे नौकरियों में कोई बड़ी कमी नहीं आ रही है। और जो लोग एआई सिस्टम को संभाल सकते हैं – जैसे कंसल्टेंट, वकील, सॉफ़्टवेयर इंजीनियर, एनालिस्ट और डिज़ाइनर – उनके काम के नतीजे और वेतन बढ़ रहे हैं। जब एआई मेहनत वाले या दोहराव वाले काम करने लगता है, तो सही फ़ैसला लेने की क्षमता, क्लाइंट के साथ रिश्ते और जवाबदेही ज़्यादा अहम हो जाती है।

एक यूरोपीय प्रधानमंत्री एक इंटरव्यू में मानते हैं कि यूरोप ने शुरुआत धीमी की थी, लेकिन ज़ोर देकर कहते हैं कि अब वह तेज़ी से आगे बढ़ रहा है और यूरोपीय एआई प्रोडक्टिविटी में नई तेज़ी ला रहा है। घर पहुँचने पर कैरोलिन यह बात क्रिश्चियन को बताती हैं।

कैरोलिन: शायद मेरा बॉस उतना भी बुरा नहीं है।
क्रिश्चियन: प्रोडक्टिविटी में आए उछाल का मज़ा लो।
क्रिश्चियन: यह एक लैगिंग इंडिकेटर है।

मई 2028 – कंप्यूटिंग क्षमता की कमी

दुनिया अब और ज़्यादा कंप्यूटिंग क्षमता की मांग कर रही है।

एआई चिप सप्लाई चेन में पहले आई हर रुकावट का कोई न कोई समाधान निकाल लिया गया था। जब चिप बनाने वाली फैक्ट्रियों की कमी हुई, तो TSMC और Samsung ने और फैक्ट्रियां बनाईं। जब US के पावर ग्रिड अतिरिक्त डेटा सेंटर्स का बोझ नहीं उठा पाए, तो लैब्स ने मोबाइल गैस इंजन खरीदे और साइट पर ही अपनी बिजली बनाई। जब हाई-बैंडविड्थ मेमोरी की सप्लाई कम हुई, तो कंज्यूमर प्रोडक्ट्स के लिए तय कैपेसिटी को दूसरी तरफ मोड़ दिया गया – इसका नतीजा यह हुआ कि स्मार्टफ़ोन की कीमतें बढ़ गईं, लेकिन यह किसी और की समस्या थी। पर यह रुकावट अलग है।

डच सेमीकंडक्टर कंपनी ए.एस.एम.एल इकलौती ऐसी कंपनी है जो EUV मशीनें बनाती है, जिनका इस्तेमाल TSMC एआई चिप बनाने के लिए करती है। सालाना प्रोडक्शन 60 से बढ़कर 85 मशीनें हो गया है – यह एक अच्छा सुधार है, लेकिन एआई की तेज़ी से बढ़ती मांग के मुकाबले यह काफ़ी नहीं है। ए.एस.एम.एल के 5,000 से ज़्यादा सप्लायर हैं। अगर उनमें से कोई भी अपना टारगेट पूरा नहीं कर पाता, तो पूरी सप्लाई चेन धीमी पड़ जाती है। इसकी इंजीनियरिंग इतनी जटिल है कि मशीन के 1,00,000 पार्ट्स में से किसी एक में भी सुधार करने के लिए PhD और सालों के खास अनुभव की ज़रूरत होती है। ऐसे लोग रातों-रात कहीं से पैदा नहीं किए जा सकते।

वॉशिंगटन को यह बात पसंद नहीं है कि ए.एस.एम.एल अभी भी अपनी कुछ पुरानी इमर्शन लिथोग्राफ़ी मशीनें - जिन्हें इंडस्ट्री में ‘DUVi’ कहा जाता है - चुनिंदा चीनी कंपनियों को एक्सपोर्ट करती है, जो इनका इस्तेमाल चीन की थोड़ी कम एडवांस्ड एआई चिप बनाने के लिए करती हैं।

ओपन सोर्स के मामले में कुछ समय के लिए सहमति बनने के बाद, पिछले एक साल में अमेरिका और चीन के रिश्ते फिर से खराब हो गए हैं। वॉशिंगटन को चिंता है कि एक बार जब चीन अपनी घरेलू सेमीकंडक्टर इंडस्ट्री को पूरी तरह से विकसित कर लेगा, तो वह अमेरिका से आगे निकल जाएगा। चीन बहुत तेज़ी से अपनी ऊर्जा क्षमता बढ़ा रहा है, जबकि इसके मुकाबले अमेरिका में बिजली का उत्पादन स्थिर बना हुआ है। अगर एआई का मुकाबला सबसे ज़्यादा डेटा सेंटर बनाने का बन जाता है, तो लंबे समय में चीन ही जीतेगा। बीजिंग को इस बात की चिंता है कि चीन के सेमीकंडक्टर इकोसिस्टम के पूरी तरह विकसित होने से पहले ही वॉशिंगटन मिलिट्री एआई के मामले में ऐसी बढ़त हासिल कर लेगा जिसे दोबारा पाना मुश्किल होगा। अगर ऐसा होता है, तो अमेरिका अपनी एआई बढ़त का इस्तेमाल जियोपॉलिटिकल फ़ायदे हासिल करने के लिए कर सकता है। बीजिंग में चिंता करने वालों को अमेरिकी एआई कंपनियों के उन सी.ई.ओ. की बातों से भी कोई राहत नहीं मिलती, जो मिलिट्री एआई का इस्तेमाल करके तानाशाही सरकारों को ‘लोकतांत्रिक’ बनाने के बारे में खुलकर बात करते हैं।

वॉशिंगटन को यह एहसास हो गया है कि उसके पास कार्रवाई करने के लिए बहुत कम समय है। एआई के क्षेत्र में उसकी बढ़त मुख्य रूप से उन होशियारी भरे एक्सपोर्ट कंट्रोल का नतीजा है जो सालों पहले डच EUV मशीनों और अमेरिकी एआई चिप पर लागू किए गए थे। अब वह इस दिशा में और भी कड़े कदम उठा रहा है। वह हेग (नीदरलैंड्स) पर दबाव बना रहा है कि वह ए.एस.एम.एल के बाकी एक्सपोर्ट और उसकी DUVi मशीनों की सर्विसिंग को रोक दे। यह मामला काफी गंभीर हो गया है, क्योंकि चीन इन्हीं मशीनों का इस्तेमाल स्मार्टफ़ोन और लैपटॉप जैसे रोज़मर्रा के सामान के लिए घरेलू चिप बनाने में करता है।

डच लोग इसका विरोध कर रहे हैं और यूरोपीय संघके दूसरे सदस्य देशों से समर्थन मांग रहे हैं। वे वॉशिंगटन की दलील तो समझते हैं, लेकिन किसी के हुक्म पर चलना नहीं चाहते; और तो और, वे ऐसी सरकार की वजह से किसी बड़ी ताकत वाले टकराव में नहीं फंसना चाहते, जिसने पिछले दो सालों में यूरोप पर धौंस जमाई हो।

आयोग डच लोगों का समर्थन करता है, लेकिन कई सदस्य देश इस बात से डरे हुए हैं कि अगर यूरोप इन मशीनों का एक्सपोर्ट जारी रखता है, तो अमेरिका जवाबी कार्रवाई कर सकता है। यूरोप का रुख ठीक से तय होने से पहले ही बंट जाता है।

धोखा महसूस करने के बाद, डच लोग जापान और दक्षिण कोरिया की ओर रुख करते हैं - ये ऐसे देश हैं जिनकी हार्डवेयर सप्लाई चेन में अहम भूमिका है और उन पर भी अमेरिकी दबाव है - ताकि मिलकर कोई जवाब तैयार किया जा सके। लेकिन ये दोनों देश अमेरिकी सैन्य मदद पर बहुत ज़्यादा निर्भर हैं और पिछले दो हफ़्तों में ही अमेरिकी अधिकारियों ने यहाँ का दौरा भी किया है। वे विनम्रतापूर्वक मना कर देते हैं।

जब डच कंपनियां अपनी बात पर अड़ी रहती हैं, तो वॉशिंगटन उन्हें धमकी देता है। वह ‘फ़ॉरेन डायरेक्ट प्रोडक्ट रूल’ का इस्तेमाल कर सकता है। यह नियम वॉशिंगटन को दुनिया में कहीं भी, किसी के भी द्वारा बनाए गए किसी भी प्रोडक्ट पर अपना अधिकार जताने की इजाज़त देता है, बशर्ते उसे अमेरिकी टेक्नोलॉजी या सॉफ़्टवेयर का इस्तेमाल करके बनाया गया हो। इसी नियम का इस्तेमाल करके वॉशिंगटन ने 2020 में Huawei का गला घोंटा था। ए.एस.एम.एल की मशीनें इस नियम के दायरे में कई तरह से आती हैं। अगर ए.एस.एम.एल चीन को कोई भी DUVi मशीन बेचती है, तो वह अमेरिकी कानून का उल्लंघन करेगी। कंपनी को भारी-भरकम जुर्माने का सामना करना पड़ सकता है – जैसे एक्सपोर्ट की सुविधाओं पर रोक, सिविल जुर्माना और सैद्धांतिक रूप से, अलग-अलग अधिकारियों पर आपराधिक दायित्व। ऐसे जुर्माने से अमेरिका को भी नुकसान होगा, जो ए.एस.एम.एल की मशीनों पर निर्भर है। लेकिन ए.एस.एम.एल वॉशिंगटन की धमकी को नज़रअंदाज़ करने का जोखिम नहीं उठा सकती। आखिर में डच कंपनी झुक गई।

ब्रसेल्स में, कैरोलिन मीटिंग्स के बीच अपने फ़ोन पर ख़बरें पढ़ती है। वह 2026 के उस मेमो के बारे में सोचती है जिसमें उसने मज़बूत स्थिति बनाने की ज़रूरत पर बात की थी। उसे अपने डायरेक्टर का दोस्ताना चेहरा याद आता है, जब उन्होंने उससे कहा था कि यह एक सोच-समझकर दिया गया योगदान था।

क्रिश्चियन: यह एक वॉर्निंग शॉट है।
क्रिश्चियन: मुझे बताओ कि वे इसे वॉर्निंग शॉट ही मान रहे हैं।
कैरोलिन: मेरे साथ काम करने वाले तो ऐसा ही मान रहे हैं।
कैरोलिन: बाकी लोग इसे एक झटका मान रहे हैं।
क्रिश्चियन: ठीक है।
क्रिश्चियन: समझ गया।
कैरोलिन: मेरा मतलब है, मैं समझती हूँ कि US ने ऐसा क्यों किया।
कैरोलिन: लेकिन हम बदले में एक भी चीज़ पर बातचीत नहीं कर पाए।
क्रिश्चियन: यह बहुत बुरा हुआ।

अगस्त 2028 – आने वाले समय के संकेत

एआई मॉडल अब अंग्रेज़ी में नहीं सोचते हैं।

डिजिटल स्क्रैचपैड पर विचार लिखने के बजाय – जो सिस्टम 2025 की शुरुआत से इस्तेमाल हो रहा था और जिसे इंसान पढ़ सकते हैं – नए सिस्टम नंबरों की लंबी लिस्ट का इस्तेमाल करते हैं, जिन्हें ‘हाई-डायमेंशनल वेक्टर’ कहा जाता है। इन्हें कोई भी, यहाँ तक कि दूसरे एआई मॉडल भी, ठीक से समझ नहीं सकते। अपने जटिल विचारों को अंग्रेज़ी में बदलने की ज़रूरत न होने के कारण, ये सिस्टम तेज़ी से और गहराई से सोचते हैं। इससे उनकी बुद्धिमत्ता और क्षमता में तेज़ी से बढ़ोतरी होती है।

सुरक्षा शोधकर्ता जो इस काम पर नज़र रख रहे हैं, वे चिंतित हैं – मॉडलों को नियंत्रित करने की उनकी कई रणनीतियाँ सीधे तौर पर इन स्क्रैचपैड की उपलब्धता पर निर्भर थीं। हमें कैसे पता चलेगा कि मॉडल गुपचुप तरीके से अपने स्वार्थों को पूरा नहीं कर रहे हैं? अगर दुरुपयोग की निगरानी करने वाले तंत्र तर्क को नहीं समझ पाएंगे, तो वे चिंताजनक व्यवहार को कैसे पकड़ पाएंगे? ब्रसेल्स में, विशेषज्ञ यूरोपीय संघ के एआई कार्यालय से डेवलपर्स को स्क्रैचपैड-आधारित प्रणालियों पर वापस लौटने के लिए बाध्य करने या अन्य सबूत पेश करने की मांग कर रहे हैं जिससे उन्हें पता चले कि अंदरूनी तौर पर क्या हो रहा है। लेकिन एआई कार्यालय पहले से ही दो अमेरिकी डेवलपर्स के खिलाफ गरमागरम कार्यवाही में उलझा हुआ है। ट्रांस-अटलांटिक संबंध इससे अधिक बोझ नहीं उठा सकते।

ज़्यादातर लोगों के लिए, इसका सबसे सीधा असर क्षमताओं पर पड़ता है। जो मॉडल पहले कई दिनों तक चलने वाले रिसर्च प्रोजेक्ट्स को भरोसेमंद तरीके से पूरा नहीं कर पाते थे, वे अब ऐसा कर सकते हैं। अमेरिका में, जो एम्प्लॉयर अब तक नौकरी में कटौती करने से बच रहे थे, वे अब ऐसा करने लगे हैं। एंट्री-लेवल पर हायरिंग और भी धीमी हो जाती है। बेरोज़गारी तेज़ी से बढ़ती है।

यूरोप में लेबर पर दबाव कम है, लेकिन ग्रोथ भी कम है: इसकी इकॉनमी 1.6% की दर से बढ़ रही है, जबकि अमेरिका में यह दर 3.8% है। यह अंतर साफ दिखता है और माना जाता है कि ऐसा एआई से मिलने वाले फ़ायदे (वैल्यू कैप्चर) में अंतर की वजह से है। यूरोप के पास भी ज़्यादातर वही मॉडल उपलब्ध हैं, लेकिन वह उनसे वैसा आर्थिक फ़ायदा नहीं उठा पा रहा है। इसके तीन कारण हैं।

पहली बात है मालिकाना हक। जिन एआई कंपनियों और इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोवाइडर्स की कमाई तेज़ी से बढ़ रही है, वे सभी अमेरिका में हैं। यूरोप में भी AI-बेस्ड स्टार्टअप्स हैं, लेकिन उन्हें बड़े पैमाने पर आगे बढ़ाने के लिए अमेरिकी वेंचर कैपिटल की ज़रूरत पड़ती है, और तेज़ी से बढ़ने वाले स्टार्टअप्स अक्सर विदेश चले जाते हैं।

दूसरी बात है इसे अपनाने की। यूरोप में पायलट प्रोजेक्ट्स के बावजूद, अमेरिकी कंपनियों ने अपने कामकाज के तरीकों में एडवांस्ड एआई को शामिल करने के लिए ज़्यादा तेज़ी से कदम उठाए हैं। कुछ यूरोपीय कंपनियाँ बिखरे हुए नियमों की वजह से, तो कुछ मैनेजमेंट की जोखिम से बचने वाली आदत या ऐसी अंदरूनी नीतियों के कारण पीछे रह जाती हैं , जो उन्हें कमज़ोर घरेलू विकल्पों का इस्तेमाल करने के लिए मजबूर करती हैं। मिलान की एक लॉ फर्म, जो कभी इटली के कमर्शियल लॉ की अपनी जानकारी के लिए ज़्यादा फ़ीस लेती थी, अब एक ऐसी अमेरिकी फ़र्म से मुक़ाबला कर रही है जिसका एआई इटली, फ़्रांस और जर्मनी के कानूनों से जुड़े मामलों को एक साथ, तेज़ी से और कम लागत में संभालता है। इटैलियन फ़र्म के वकीलों को अभी भी एडवांस्ड एआई मॉडल इस्तेमाल करने की इजाज़त नहीं है। यही स्थिति कंसल्टिंग, सॉफ़्टवेयर, मार्केटिंग और फ़ाइनेंस के क्षेत्रों में भी देखने को मिलती है।

तीसरी बात यह है कि जो कंपनियाँ इसे अपनाती हैं, उनके साथ क्या होता है। अमेरिका की कई मीडियम साइज़ की कंपनियाँ कुछ ही महीनों में एआई के हिसाब से खुद को बदल लेती हैं – जैसे ऑर्गनाइज़ेशन का ढांचा सरल बनाना, छोटी टीमें बनाना और काम की रफ़्तार बढ़ाना – जबकि यूरोप की कंपनियों को इसमें अक्सर कई साल लग जाते हैं। वर्क काउंसिल शक्तिशाली एआई टूल्स को बड़े पैमाने पर अपनाने की प्रक्रिया को धीमा कर देती हैं; साथ ही रोज़गार से जुड़ी सुरक्षा नीतिओं के कारण ऐसे कर्मचारियों को हटाना मुश्किल हो जाता है जिनकी नौकरी को ऑटोमेट किया जा सकता है, और जिनकी ज़रूरत लेबर मार्केट के उन हिस्सों में हो सकती है जहाँ कर्मचारियों की कमी है। हालांकि एआई की मदद से कुछ कर्मचारी बहुत ज़्यादा प्रोडक्टिव हो जाते हैं, लेकिन यूरोप में ऐसे कर्मचारियों की संख्या भी बढ़ रही है जो बस काम करने का दिखावा करते हैं: वे लॉग इन करते हैं और मीटिंग में शामिल होते हैं, लेकिन बाकी ज़्यादातर काम एआई एजेंट बहुत कम समय में कर देते हैं। इसके कुछ फ़ायदे भी हैं: जैसे परिवार के साथ ज़्यादा समय बिताना, लंबे लंच ब्रेक लेना और दोपहर में टहलना। लेकिन इसका दूसरा पहलू यह है कि कंपनियों को एआई और बिना काम के कर्मचारियों, दोनों के लिए पैसे खर्च करने पड़ते हैं; और जो पैसा कंपनी की ग्रोथ में लगना चाहिए, वह मौजूदा कर्मचारियों को में ही खर्च हो जाता है।

यह ऐसे समय में हो रहा है जब यूरोप की अर्थव्यवस्था पहले से ही मुश्किलों से जूझ रही है - इसके मुख्य मैन्युफैक्चरिंग उद्योग तेज़ी से विदेशों में जा रहे हैं, और इसकी कार बनाने वाली कभी मशहूर रही कंपनियाँ सबसे ज़्यादा प्रभावित हुई हैं। इलेक्ट्रिक गाड़ियों के दौर में पीछे रह जाने के कारण, उन्हें सस्ती और बेहतर चीनी कारों से भारी दबाव का सामना करना पड़ रहा है, जिससे लाखों कर्मचारियों का भविष्य अनिश्चित हो गया है।

और अब यूरोप का टैक्स बेस भी कमज़ोर पड़ने लगा है। जो पैसा पहले मज़दूरों के पास जाता था, वह अब ज़्यादातर अमेरिकी कंपनियों और उनके निवेशकों के पास जा रहा है। इसमें से काफ़ी पैसा कम टैक्स वाले उन इलाकों से होकर गुज़रता है जहाँ तक यूरोप के सरकारी खज़ानों की पहुँच नहीं है। साथ ही, पूरे महाद्वीप में बेरोज़गारी भत्ते के दावे करने वाले लोगों में भी बढ़ोतरी हो रही है – भले ही यह बढ़ोतरी बहुत ज़्यादा न हो, लेकिन अमेरिका के आँकड़े बताते हैं कि हालात किस तरफ जा रहे हैं। और एआई के तेज़ी से बढ़ते चलन की वजह से दुनिया भर में ब्याज दरें बढ़ रही हैं, जिससे फ्रांस जैसे देशों को हर साल अपने सरकारी कर्ज़ को चुकाने में बजट का ज़्यादा हिस्सा खर्च करना पड़ रहा है।

कैरोलिन: मुझे लगता है कि अब मैं तुम्हें समझ गई हूँ।
कैरोलिन: यूरोप की बर्बादी के सिलसिले का एकमात्र असली इलाज आर्थिक विकास है।
कैरोलिन: लेकिन विकास तो अमेरिका में हो रहा है।
क्रिश्चियन: सही कहा।
कैरोलिन: अभी मेरी मुलाकात अपनी एक पुरानी क्लासमेट से हुई।
कैरोलिन: वह दिन में 3 घंटे काम करती है।
कैरोलिन: बाकी काम अपने एजेंटों से करवाती है।
कैरोलिन: सुना है, उसने बागवानी शुरू कर दी है।
क्रिश्चियन: अच्छी बात है।

नवंबर 2028 – जनता की आवाज़

यह अमेरिका के राष्ट्रपति का चुनाव है। हमेशा की तरह, पूरी दुनिया की सांसें थमी हुई हैं।

एआई इस कैंपेन का सबसे अहम मुद्दा था, लेकिन वैसा नहीं जैसा इंडस्ट्री ने सोचा था। अब ज़्यादातर अमेरिकी एआई से दूर ही रहना चाहते हैं। क्लाइमेट ग्रुप्स को डेटा सेंटर्स में होने वाली एनर्जी की खपत की चिंता है; यूनियनों को नौकरियों की फ़िक्र है। टीचर इसे क्लासरूम से बाहर रखना चाहते हैं; वकील इसे कोर्टरूम से दूर रखना चाहते हैं।

प्राइमरी चुनावों के दौरान, लेफ्ट और राइट दोनों तरफ़ के नेताओं ने एआई के कड़े विरोध वाले एजेंडे पर चुनाव लड़ा। उन्होंने डेटा सेंटर पर रोक लगाने, कर्मचारियों की सुरक्षा, शिक्षा में एआई पर बैन और उम्र की पाबंदियाँ पर रोक लगाने की मांग की। आम चुनावों में ज़्यादातर ऐसे उम्मीदवार सामने आए जिनकी सोच मिली झुली थी - और इंडस्ट्री से मज़बूत रिश्तों ने राष्ट्रपति पद के कैंपेन में मदद भी की - लेकिन एआई को लेके लोगों की नाराज़गी या भावना खत्म नहीं हुई। लोग नाराज़ हैं।

एआई के खिलाफ़ राय अलग-अलग राजनीतिक विचारधाराओं में फैली हुई है, लेकिन इससे लोग एक साथ नहीं आ रहे हैं। दरारें सिर्फ़ डेमोक्रेट और रिपब्लिकन के बीच ही नहीं, बल्कि उन रईसों के बीच भी पैदा हुई हैं जो एआई का इस्तेमाल करते हैं और उस मध्यम वर्ग के बीच भी जिन्हें यह डरावना, मानवता के खिलाफ या अनैतिक लगता है और जो अपनी आँखों के सामने असमानता को तेज़ी से बढ़ते हुए देख रहे हैं। लोग ज़्यादा से ज़्यादा सड़कों पर उतर रहे हैं; कई टेक कंपनियों के सी.ई.ओ पर जानलेवा हमले हुए हैं। हाल ही में एक डेटा सेंटर में आग लगा दी गई थी। लेकिन अमेरिकी सरकार एआई पर रोक नहीं लगा सकती; पिछले राष्ट्रपति की तरह ही नए राष्ट्रपति भी, इस बात को लेकर पक्के तौर पर मानते हैं कि अमेरिका को चीन से एआई की रेस जीतनी होगी, वरना राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए ऐसे खतरे पैदा हो सकते हैं जो बहुत गंभीर हो सकते हैं और जिन्हें स्वीकार नहीं किया जा सकता। इसलिए, जनता जो चाहती है उसे सच में वह देने के बजाय, वे उसे शांत करने के लिए कुछ कामचलाऊ उपाय करते हैं।

यूरोप में भी जनता एआई का विरोध कर रही है। लोग अमेरिकी टेक कंपनियों से नाराज़ हैं और चाहते हैं कि सरकारें इस पर कार्रवाई करें। वे ज़्यादा मज़बूत सुरक्षा उपायों की मांग कर रहे हैं, लेकिन उन्हें यह एहसास नहीं है कि यूरोप के लिए फिलहाल के सुरक्षा उपायों का खर्च उठाना भी मुश्किल हो रहा है।

इस बीच, यूरोप की एआई कंपनियाँ और पिछड़ती जा रही हैं।

पब्लिक इन्वेस्टमेंट, कंप्यूट सब्सिडी और प्राथमिकता के आधार पर खास खरीद कॉन्ट्रैक्ट के बावजूद, Helios और Atlas के बीच का अंतर और बढ़ गया है। अमेरिकी लैब, जो ज़्यादातर अपना कोड खुद लिखने वाले इंटरनल एआई एजेंटों की मदद से काम कर रही हैं, इंसानों के मुकाबले एल्गोरिदम में दोगुनी से भी ज़्यादा तेज़ी से तरक्की कर रही हैं। सिर्फ़ कंप्यूट की कमी ही और तेज़ी से होने वाली तरक्की को रोक रही है, और Atlas के पास अब तक के इतिहास में किसी भी दूसरे सिस्टम से ज़्यादा कंप्यूट पावर है। Helios का रिसर्च मल्टीप्लायर - जिसके पास बहुत कम प्रोसेसिंग पावर है और जो इंटरनल इस्तेमाल के लिए सबसे अच्छे अमेरिकी मॉडल का इस्तेमाल नहीं कर सकता - मुश्किल से ही कोई असर दिखा पा रहा है। हर महीने यह अंतर और बढ़ता जा रहा है।

सभी के मिलकर प्रयास करने से लोगों को फ़ायदा तो हो रहा है, लेकिन इससे यूरोप की सॉवरेनिटी में कोई खास बढ़ोतरी नहीं हो रही है। ‘फ्रंटियर एआई इनिशिएटिव’ ने अपने ‘इंटरप्रिटेबिलिटी एजेंडा’ (एआई के काम करने के तरीके को समझने की कोशिश) पर शानदार प्रगति की है, जिससे दुनिया भर में एआई की विश्वसनीयता बढ़ी है, लेकिन इसके ‘वर्ल्ड-मॉडल प्रोग्राम’ को चुरा लिया गया है। जैसे ही नतीजे बेहतर होने लगे, Atlas ने इस पहल की प्रगति पर ध्यान दिया, तेज़ी से अपनी टीम बनाई और भारी-भरकम कंप्यूट बजट का लालच देकर ‘फ्रंटियर एआई इनिशिएटिव’ के चार बेहतरीन रिसर्चर्स को अपनी ओर मिला लिया। जाते समय अपने साथियों को उन्होंने बताया कि वे वहीं बने रहना चाहते थे; उन्हें इस यूरोपीय प्रोजेक्ट पर भरोसा था और वे इसमें मदद करना चाहते थे। लेकिन कभी-कभी, सिर्फ़ भरोसा ही काफ़ी नहीं होता।

आम लोगों को दिख रहा है कि यूरोपीय संघकी बड़ी एआई रणनीति नाकाम हो रही है। निवेश के बावजूद Helios जैसी कंपनियां बराबरी पर नहीं आ पाई हैं। DSA के तहत रेगुलेटरी कदमों से मुकाबला बराबरी का नहीं हो पाया है; इनका सबसे साफ़ असर अमेरिकियों को नाराज़ करने और यूरोप-अमेरिका के रिश्तों को खराब करने के तौर पर दिखा है।

लेकिन यूरोप ने इस प्रोजेक्ट में बहुत ज़्यादा राजनीतिक और असल पूंजी लगाई है। अगर वे अपनी नाकामी मानते हैं, तो इसका मतलब होगा यह स्वीकार करना कि उन्होंने दो साल और अरबों यूरो एक ऐसी चीज़ पर बर्बाद कर दिए जिसका कोई नतीजा नहीं निकलने वाला। इसलिए वे और ज़्यादा ज़ोर-शोर से इसमें लगे हुए हैं।

यूरोपियन कमीशन ने €20 बिलियन के नए ‘यूरोपियन एआई सॉवरेनिटी फ़ंड’ का ऐलान किया है, जो photonics, edge एआई और ‘अगली लहर’ की दूसरे उदाहरणों पर केंद्रित है। यह साफ़ तौर पर एक मुश्किल चुनौती है। जिन संस्थाओं को पहले पैसे का इस्तेमाल करके नई और बड़ी क्षमताएं विकसित करने में कामयाबी नहीं मिली, उन्हीं से अब पहले से और मुश्किल लक्ष्य और कम समय में दोबारा कोशिश करने को कहा जा रहा है। पोलैंड के एक MEP ने एक रिसेप्शन में कैरोलिन से कहा कि यह ऐसा पहला जानकारी में मामला है जो बिना किसी पत्ते के दांव बढ़ाने जैसा है।

दरारें दिखने लगी हैं। जर्मनी में, एक पॉपुलिस्ट पार्टी – जो साफ़ तौर पर AI-विरोधी एजेंडे (मशीनों को रोकें, जर्मन नौकरियां बचाएं) पर चुनाव लड़ रही है – आने वाले फ़ेडरल चुनाव में सबसे आगे चल रही है। इटली में, जहां पिछले पांच सालों से यूरो-संदेही (Eurosceptic) सरकारें आम बात रही हैं, वहां पॉपुलिस्ट पार्टियां खुलेआम यूरोपीय संघकी सदस्यता पर जनमत संग्रह के लिए प्रचार कर रही हैं।

पेरिस में अब सब्र का बांध टूट रहा है। Élysée को अब भरोसा नहीं रहा कि यूरोपीय संघका प्लान तय समय-सीमा में नतीजे दे पाएगा। Helios, जो LLM के क्षेत्र में यूरोप की एकमात्र बची हुई असली कंपनी है, हो सकता है कि कुछ ही महीनों में मुकाबले से हमेशा के लिए बाहर हो जाए। एक लंबी बातचीत के बाद, फ्रांस ने Helios में €15 बिलियन के सरकारी निवेश का ऐलान किया है। इसके बदले उसे 17% इक्विटी हिस्सेदारी, बोर्ड में एक सीट और भविष्य में फ़ंड जुटाने के दौर पर वीटो पावर मिलेगी।

क्रिश्चियन: फ्रांस ने अभी-अभी एक मुरदा खरीदा है।
कैरोलिन: यह सही नहीं है।
कैरोलिन: ये लोग असल में कुछ करने की कोशिश कर रहे हैं।
क्रिश्चियन: इससे सच्चाई नहीं बदलती।

जनवरी 2029 – रोबोट इकॉनमी के सपने

चीन की एआई रणनीति यूरोपीय संघजैसी ही है, बस एक अहम बात अलग है: ऐसा लगता है कि यह काम कर रही है। ब्रसेल्स की तरह ही, बीजिंग भी अपनी सबसे होनहार कंपनियों को सपोर्ट कर रहा है, सब्सिडी और खरीद के नियमों के ज़रिए इंडस्ट्री को सुरक्षा दे रहा है, और तेज़ी से इसे अपनाने पर ज़ोर दे रहा है। लेकिन एक सेंट्रलाइज़्ड, सत्तावादी देश के लिए अपना एजेंडा लागू करना, एक लिबरल डेमोक्रेसी वाले सत्ताईस अलग-अलग विचारों वाले सदस्य देशों की तुलना में आसान होता है। जब अलग-अलग लैब में कंप्यूटिंग क्षमता बंटी हुई थी, तो चीनी कम्युनिस्ट पार्टी ने बस उन लैब को अपने रिसोर्स एक साथ लाने का आदेश दिया; यूरोपियन कमीशन के पास ऐसी कोई ताकत नहीं है। चीन का टैलेंट पूल ज़्यादा बड़ा है और उसे सस्ती, भरपूर एनर्जी मिलती है। चीन की एडवांस्ड लैब अमेरिका से बस एक साल पीछे हैं।

खास बात यह है कि चीन को नहीं लगता कि उसकी रणनीति कॉग्निटिव एआई के सबसे एडवांस्ड लेवल पर होने पर निर्भर करती है। सरकार हमेशा से चाहती रही है कि एआई सबसे पहले फिजिकल इकॉनमी को बढ़ावा दे, और रोबोटिक्स मैन्युफैक्चरिंग में उसे बहुत बड़ा फ़ायदा मिला हुआ है। सरकार की भारी सब्सिडी की वजह से सालाना ह्यूमनॉइड प्रोडक्शन 10 लाख यूनिट से ज़्यादा हो गया है; अब एक घरेलू रोबोट €10,000 में खरीदा जा सकता है। शेनझेन जैसे शहरों में सड़कों की सफ़ाई करते ह्यूमनॉइड या चार पैरों वाले रोबोट से पैकेज की डिलीवरी होना आम बात है। बीजिंग को उम्मीद है कि एआई के मामले में सिलिकॉन वैली के मुक़ाबले बस उसके आस-पास बने रहने से ही उसे अपने इंडस्ट्रियल फ़ायदे का लाभ मिलना शुरू हो जाएगा, क्योंकि रोबोटिक्स से जुड़ी और भी क्षमताएँ सामने आ रही हैं।

यह दांव अभी भी सही लग रहा है और अमेरिका में चिंता बढ़ रही है। अमेरिकी राजनेता चीन के साथ एआई की होड़ को ‘दूसरा कोल्ड वॉर’ कहने लगे हैं। जब अमेरिका ने ए.एस.एम.एल को चीन को एक्सपोर्ट रोकने के लिए मजबूर किया, तो तनाव और बढ़ गया; इसके बाद बीजिंग और वॉशिंगटन, दोनों ने ही अपने एआई डेवलपमेंट की सुरक्षा बढ़ा दी है। अमेरिका में, इंटेलिजेंस एजेंसियां रिसर्चर्स की जांच-पड़ताल करती हैं और उन्हें ‘फ्रंटियर मॉडल वेट्स’ (एआई मॉडल के अहम पैरामीटर्स) तक पहुंचने के लिए सिक्योरिटी क्लीयरेंस की ज़रूरत होती है; फेडरल सरकार अक्सर चीन पर एल्गोरिदम से जुड़े सीक्रेट्स चुराने का आरोप लगाती रहती है। चीन ने Zimo को आंशिक रूप से सरकारी नियंत्रण में ले लिया है और अपनी पूरी ताकत इसके एआई प्रयासों में लगा रहा है। जब एक बड़े Zimo डेटा सेंटर के पास चीनी पावर ग्रिड का कुछ हिस्सा ठप हो गया, तो ऐसी अफवाहें फैल गईं कि यह अमेरिका समर्थित, AI-आधारित साइबर हमले का नतीजा था।

क्रिश्चियन: मैं शेनझेन में हूँ।
क्रिश्चियन: नाविक वाली टोपी पहने एक रोबोट ने अभी-अभी मेरे लिए नेग्रोनी बनाई।
क्रिश्चियन: यहाँ तो पेपरक्लिप की तरह रोबोट बनाए जा रहे हैं।
कैरोलिन: क्या नेग्रोनी अच्छी थी?
क्रिश्चियन: हाँ, बहुत बढ़िया।

अप्रैल 2029 – सभी क्षेत्रों तक पहुँच

एआई की मांग तेजी से बढ़ रही है, और कंप्यूटिंग संसाधनों की आपूर्ति इसकी पूर्ति नहीं कर पा रही है। लैब अपने एडवांस्ड मॉडल्स तक पहुँच को सीमित कर रही हैं और कीमतें बढ़ा रही हैं; वहीं, बिज़नेस टोकन के लिए ज़ोर-शोर से मांग कर रहे हैं।

दुनिया की70% एआई कंप्यूटिंग क्षमता अमेरिकी कंपनियों के पास है और वे अपनी सेवाएँ पूरी दुनिया में बेचती हैं। इसका मतलब है कि अमेरिकी इंफ्रास्ट्रक्चर का इस्तेमाल विदेशी कंपनियों की प्रोडक्टिविटी बढ़ाने, विदेशी सेनाओं को ज़्यादा काबिल बनाने और विदेशी लैब को ज़्यादा कॉम्पिटिटिव बनाने के लिए किया जा रहा है – हालाँकि, आखिरी वाला काम गैर-कानूनी ‘डिस्टिलेशन अटैक’ के ज़रिए हो रहा है, न कि सही तरीके से बिक्री करके। वॉशिंगटन इस बात को लेकर दिन-ब-दिन ज़्यादा चिंतित होता जा रहा है।

अमेरिकी राष्ट्रीय सुरक्षा समीक्षा को औपचारिक रूप दे दिया गया है और अब यह दिखावा नहीं किया जाता कि यह उनकी इच्छा से हो रहा है। सबसे सक्षम मॉडलों तक पहुँच को डिफ़ॉल्ट रूप से सीमित कर दिया गया है, जिसका एक कारण अमेरिकी ग्राहकों के लिए कंप्यूटिंग क्षमता बचाना है। घरेलू सरकारी एजेंसियों को ये मॉडल सबसे पहले मिलते हैं; उसके बाद सहयोगी सरकारों को; और विरोधी देशों को ये बिल्कुल नहीं मिलते।

लेकिन मॉडल और उनके वेट्स तक पहुँच एक बात है। कंप्यूटिंग क्षमता की कमी का मतलब है कि इन्फेरेंस (inference) भी बहुत कीमती हो गया है, और अप्रैल तक वाशिंगटन का सब्र जवाब दे गया। उसने न सिर्फ़ पहुँच को सीमित करना शुरू किया, बल्कि इस्तेमाल को भी सीमित करना शुरू कर दिया, यहाँ तक कि उन देशों के लिए भी जो उसके साथ जुड़े हुए थे।

फ्रंटियर इन्फरेंस सर्विसेज़ रूल (FISR) देशों के आधार पर लाइसेंस देने का एक सिस्टम है। टियर 1 देशों – जैसे कि करीबी सहयोगी देश (अंग्रेज़ी बोलने वाले ‘फाइव आइज़’ इंटेलिजेंस-शेयरिंग देश, साथ ही जापान, दक्षिण कोरिया, ताइवान और नीदरलैंड) – को बिना किसी रोक-टोक के कमर्शियल एक्सेस और आसान रिपोर्टिंग की सुविधा मिलती है। टियर 3 वाले दुश्मन देशों, जैसे ईरान, रूस और चीन, को डिफ़ॉल्ट रूप से कोई एक्सेस नहीं दिया जाता है। यूरोप के ज़्यादातर देश बीच के टियर 2 देशों (जिनकी संख्या लगभग 100 है) में आते हैं। FISR के तहत, किसी भी प्रोवाइडर की फ्रंटियर इन्फरेंस क्षमता का कुल मिलाकर 25 प्रतिशत से ज़्यादा हिस्सा टियर 2 ग्राहकों को नहीं दिया जा सकता है; साथ ही, हर लाइसेंस की समीक्षा कई बातों के आधार पर की जाती है, जिसमें ‘अमेरिका की राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े हितों के साथ तालमेल’ भी शामिल है।

25 प्रतिशत का आंकड़ा ब्रसेल्स के लिए मायने रखता है, और यह अच्छी खबर नहीं है। US की फ्रंटियर इन्फरेंस क्षमता का लगभग एक-चौथाई हिस्सा अकेले यूरोपीय ग्राहक ही इस्तेमाल करते हैं। अगर इसे अगर लगभग 80 अन्य देशों के साथ सही ढंग से बांटा जाए, तो यूरोप के हिस्से में आने वाली क्षमता लगभग आधी हो जाएगी। जिन यूरोपीय बिज़नेस ग्राहकों के पास लंबे समय के कॉन्ट्रैक्ट नहीं हैं, उन्हें अपने प्रोवाइडर्स से एक हफ़्ते के अंदर नोटिस मिलने लगेंगे, जिनमें वॉल्यूम कम करने और कीमतें बढ़ाने की बात कही जाएगी। वे किसी दूसरी लैब वाले सप्लायर के पास भी नहीं जा सकते, क्योंकि US के सभी प्रोवाइडर्स पर एक जैसे ही प्रतिबंध लागू हैं।

यूरोप अमेरिकी एआई पर निर्भर है, लेकिन अमेरिका की यूरोप पर इस तरह की कोई निर्भरता नहीं है। कंप्यूटिंग रिसोर्स की इतनी कमी है कि यूरोपीय ग्राहकों को खोने से लैब्स की कमाई पर कोई खास असर नहीं पड़ता: उनकी क्षमता पहले से ही सीमित थी, इसलिए जो कंप्यूटिंग पावर वे अब यूरोप को नहीं बेच रहे हैं, उसे अमेरिका की अप्रत्यक्ष मांग या बस अपने अंदरूनी R&D के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है। Atlas और उसकी प्रतिस्पर्धी कंपनियाँ व्हाइट हाउस से निजी तौर पर अपना रुख नरम करने का आग्रह कर रही हैं - क्योंकि इन प्रतिबंधों से भविष्य के बाज़ार बंद होने का खतरा है और इससे उनकी छवि भी खराब हो रही है। लेकिन वे सार्वजनिक रूप से अपनी चिंताएँ ज़ाहिर करने को तैयार नहीं हैं, क्योंकि जैसे-जैसे एआई से जुड़े राष्ट्रीय सुरक्षा प्रतिबंध बढ़ रहे हैं, फ़ेडरल सरकार के साथ अच्छे संबंध और भी महत्वपूर्ण होते जा रहे हैं। इसके अलावा, उनका ध्यान ज्यादा क्षमताओं के रखने की दौड़ जीतने और उन एआई सिस्टम पर नियंत्रण बनाए रखने पर है जो उन्हें तेज़ी से चलाने वाले लोगों से भी ज़्यादा स्मार्ट होते जा रहे हैं। वॉशिंगटन पर अपना रुख बदलने का कोई खास दबाव नहीं है।

ब्रसेल्स में यूरोपियन काउंसिल की एक इमरजेंसी मीटिंग बुलाई गई। फ्रांस और जर्मनी के मंत्री ‘टियर 1’ का दर्जा पाने की मांग करने के लिए वॉशिंगटन गए। उन्हें बताया गया कि ‘टियर 2’ का दर्जा दोनों देशों के बीच ‘मौजूदा द्विपक्षीय संबंधों’ को बेहतर ढंग से दिखाता है।

घर लौटते समय मेट्रो में कैरोलिन स्क्रीन पर लिखा मैसेज पढ़ती है। उसे हमेशा से पता था कि यह पल आएगा। फिर भी, यह किसी भारी चीज़ के अचानक गिरने जैसा महसूस होता है।

कैरोलिन: अब उन्हें समझ आ गया है। लेकिन बहुत देर हो चुकी है।
क्रिश्चियन: हाँ।
क्रिश्चियन: मुझे इसी बात का डर था।
क्रिश्चियन: वे कब तक सारी एक्सेस बंद करने की धमकी देंगे?
कैरोलिन: मैं भी यही सोच रही थी।

मई 2029 – टिल्ट

इस्तेमाल की अनुमानित सीमा लागू होने के एक सप्ताह बाद, घबराए हुए व्यवसायों के कारण यूरोपीय राजधानियों में फ़ोन की घंटियाँ बज रही हैं, क्योंकि वे उसको टालने की कोशिश कर रहे हैं जिसे टाला नहीं जा सकता। एक फ्रांसीसी यूटिलिटी कंपनी के सी.ई.ओ. ने एलिसी पैलेस को फ़ोन करके बताया कि उनकी साइबर सुरक्षा टीमें पहले से ही AI-सक्षम हमलों के सामने पिछड़ रही हैं, और अमेरिकी अत्याधुनिक मॉडलों के एक्सेस को आधा करने से महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचा खतरनाक रूप से असुरक्षित हो जाएगा।

डेनमार्क की एक बड़ी लॉजिस्टिक्स कंपनी के प्रमुख ने देश के प्रधानमंत्री से कहा कि सालों से किए गए ऑप्टिमाइज़ेशन की वजह से कंपनी अब ऐसे अमेरिकी सिस्टम पर निर्भर हो गई है जिन्हें आसानी से बदला नहीं जा सकता, और उनका पूरा बिज़नेस मॉडल खतरे में है। जर्मनी के छोटे व्यवसायों के एक प्रतिनिधिमंडल ने चांसलरी को चेतावनी दी कि सिर्फ़ कीमतें बढ़ने की वजह से ही हज़ारों छोटी कंपनियाँ फ्रंटियर एआई का इस्तेमाल नहीं कर पाएँगी।

जिन यूरोपीय कंपनियों ने समझदारी दिखाते हुए अपनी सॉवरेन एआई पॉलिसी को टाल दिया या वापस ले लिया, उन्होंने सालों तक फ्रंटियर एजेंट्स के आधार पर अपना कामकाज खड़ा किया। अब उनके सामने यह खतरा है कि ये एजेंट्स उनसे छिन सकते हैं। यूरोपीय विकल्प लगभग दो साल पीछे हैं। जिन कंपनियों में कंप्लायंस डिपार्टमेंट है, उनके लिए चीनी विकल्प असल में कोई विकल्प नहीं हैं।

ब्रसेल्स में अब कोई यह नहीं कहता कि एआई को ज़रूरत से ज़्यादा बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया गया है। कैरोलिन ने महीनों से ‘बबल’ शब्द नहीं सुना है। उसके डायरेक्टर, जो पहले कहते थे कि वह बात को बढ़ा-चढ़ाकर बता रही है, अब अपना ज़्यादातर समय अलग-अलग देशों की राजधानियों में फ़ोन करके नुकसान को संभालने में बिताते हैं। एक मंगलवार की दोपहर, वे दो कॉफ़ी लेकर उसके डेस्क पर आते हैं और एक उसे थमा देते हैं। वे बिना ज़्यादा कुछ कहे कॉफ़ी पीते हैं। उसे एहसास होता है कि माफ़ी मांगने के मामले में वे बस इतना ही कर सकते हैं।

अब हर कोई समस्या को समझता है, लेकिन इसे समझना और इसे ठीक कर पाना बहुत अलग-अलग बातें हैं। Helios के मॉडल्स की मांग कंपनी की क्षमता से कहीं ज़्यादा बढ़ गई है। गीगा-फ़ैक्ट्रियों का निर्माण आख़िरकार शुरू हो गया है, लेकिन वे अगले साल तक ही चालू हो पाएंगी, और तब भी वे उस ज़रूरत का एक छोटा सा हिस्सा ही पूरा कर पाएंगी जो इस अंतर को खत्म करने के लिए ज़रूरी है।

क्रिश्चियन: पता है मज़ेदार बात क्या है?
क्रिश्चियन: Helios इन्वेस्टमेंट से फ्रांस को ज़बरदस्त फ़ायदा होने वाला है।
क्रिश्चियन: इसकी मांग बहुत ज़्यादा बढ़ गई है।
कैरोलिन: यह तो एकदम 3डी चेस जैसा है।

यूरोप की अर्थव्यवस्था का दम घुट रहा है। वॉशिंगटन के साथ कई तनावपूर्ण फ़ोन कॉल्स के बाद, यूरोपीय नेताओं ने तय किया कि कोई बड़ा कदम उठाना ज़रूरी है। अपने इतिहास में पहली बार, कमीशन ने ‘एंटी-कोअर्शन इंस्ट्रूमेंट’ (ज़बरदस्ती रोकने वाला हथियार) के तहत औपचारिक जांच शुरू की है – इसे ब्रसेल्स की प्रेस सालों से ‘ट्रेड बाज़ूका’ कहती आ रही है, जब यह सिर्फ़ एक ऐसा हथियार था जिसके इस्तेमाल की उम्मीद किसी को नहीं थी।

चार महीने की जांच-पड़ताल के बाद, यह नतीजा निकला है कि FISR आर्थिक दबाव डालने जैसा है। लेकिन इस जांच में एक ऐसी बात भी सामने आई है जो परेशान करने वाली है: साफ़ तौर पर जवाबी कार्रवाई करना खुद के ही नुकसान का कारण बन सकता है। अमेरिकी क्लाउड और डिजिटल सेवाओं पर टैरिफ लगाने से ‘फ्रंटियर इन्फरेंस’ (अत्याधुनिक एआई तकनीक) की कीमत बढ़ जाएगी, जिसे हासिल करने के लिए यूरोपीय कंपनियाँ पहले से ही जद्दोजहद कर रही हैं। सरकारी खरीद से अमेरिकी कंपनियों को बाहर रखने की बात—जो एक दशक पहले बहुत चुभने वाली बात होती—अब बेमानी हो गई है, क्योंकि ‘डिजिटल सॉवरेनिटी रेगुलेशन’ पहले ही ऐसा कर देगा।

इसलिए, प्रस्तावित उपायों में ऐसे तरीकों पर ध्यान दिया गया है जो तुरंत दिखाई नहीं देते: जैसे कि अमेरिकी लैब को सिंगल मार्केट में मिलने वाली इंटेलेक्चुअल प्रॉपर्टी सुरक्षा को रोकना, और यूरोपीय कंपनियों के अमेरिकी अधिग्रहण की जांच करना या उन्हें रोकना। इन्हें इस तरह से तैयार किया गया है कि यूरोप के अपने कंप्यूट बजट पर असर डाले बिना वाशिंगटन के एक्सपोर्टर्स को नुकसान पहुंचाया जा सके।

सबसे ज़्यादा नुकसान पहुँचाने वाला कदम लिथोग्राफ़ी सप्लाई चेन से जुड़ा है: एरिज़ोना में अमेरिकी फ़ैब्स (चिप बनाने वाली फ़ैक्टरियों) को ए.एस.एम.एल के एक्सपोर्ट और सर्विसिंग पर रोक लगाना। यह एक ऐसा ‘न्यूक्लियर’ कदम भी है, जिसके जवाब में यूरोप को ऐसी कार्रवाई का सामना करना पड़ सकता है, जिसे वह शायद बर्दाश्त न कर पाए।

जब वोटिंग की बात आती है, तो ज़रूरी बहुमत नहीं मिल पाता। नीदरलैंड और आयरलैंड ट्रांसअटलांटिक रिश्तों का हवाला देते हुए इसका विरोध करते हैं। रूस को लेकर चिंतित पोलैंड और बाल्टिक देश भी ऐसा ही करते हैं। इटली वोटिंग से दूर रहता है। आधिकारिक तौर पर, कमीशन का एक सीनियर अधिकारी पत्रकारों को बताता है कि नतीजा ‘रणनीतिक माहौल के बारे में अलग-अलग देशों की सोच’ को दिखाता है। अनौपचारिक तौर पर, फ्रांस का एक सरकारी अधिकारी उन्हीं पत्रकारों को बताता है कि डेलीगेट्स वॉशिंगटन से इतने डरे हुए हैं कि वे उस हथियार का इस्तेमाल नहीं कर पा रहे जिसे बनाने में उन्होंने एक दशक लगाया था।

कैरोलिन गर्मियों का ज़्यादातर समय संकट से निपटने वाली बैठकों में बिताती हैं। वही लोग, जो कुछ साल पहले उनसे कहते थे कि सब ठीक हो जाएगा, अब उनसे पूछ रहे हैं कि क्या अभी भी कुछ किया जा सकता है। वह उन्हें बताती हैं कि असरदार कदम उठाने का मौका 2025 और 2027 के बीच ही खत्म हो गया था। अब बस नुकसान को कम करने की ही कोशिश की जा सकती है।

फ़रवरी 2030 – लेबर शॉक

यूरोप में ‘दिखावटी काम’ का वह दौर ज़्यादा दिन नहीं चला, जिसमें लोग बागवानी करते थे और एजेंट उनका काम संभालते थे और कंपनियाँ उन्हें नौकरी से नहीं निकाल सकती थी।

यूरोपीय कंपनियाँ, जिन्हें पूरे स्टाफ को वेतन देना पड़ता है, अपने कम संसाधनों वाले अमेरिकी प्रतिद्वंद्वियों से प्रतिस्पर्धा नहीं कर सकतीं, खासकर इसलिए क्योंकि वे खराब मॉडलों और कम उपलब्ध, अधिक महंगे अनुमानों से ग्रस्त हैं। इस झटके का सबसे पहले असर उन उद्योगों पर पड़ता है जो एआई से सबसे अधिक प्रभावित हैं। सॉफ़्टवेयर कंपनियों को नुकसान होता है क्योंकि अमेरिकी कंपनियाँ कम लागत में तेजी से उत्पाद उपलब्ध कराती हैं। मध्यम स्तर की कंसल्टैंसीज़ कंपनियों को लगता है कि उनकी सलाह को अत्याधुनिक मॉडल आसानी से पहले ही जान लेते हैं, और उनके पास योगदान देने के लिए कुछ खास नहीं बचता।

इसके अलावा, एआई सिस्टम लगातार बेहतर होते जा रहे हैं। कॉग्निटिव काम (दिमागी काम) के असल ऑटोमेशन में लगातार सीखना को अक्सर आखिरी बाधा माना जाता था। इंसान अपने करियर के दौरान कॉन्टेक्स्ट, समझ और अनुभव से मिली जानकारी को विकसित करते हैं। वहीं, एआई सिस्टम हर नई बातचीत की शुरुआत उन्हीं पुराने, स्थिर पैरामीटर्स (frozen weights) के साथ करते थे। लंबे कॉन्टेक्स्ट विंडो और बाहरी मेमोरी ने इस अंतर को कुछ हद तक कम तो किया, लेकिन असल में डिप्लॉयमेंट के दौरान मॉडल ने कभी कुछ नया नहीं सीखा।

लेकिन अब यह बदल गया है। अगर Atlas का लेटेस्ट मॉडल किसी कंसल्टेंसी फर्म में छह हफ़्ते बिताता है, तो वह उसी तरह लिखना शुरू कर देता है जैसे वह फर्म लिखती है। वह यह सीख जाता है कि कौन किसकी बात मानता है, कौन से क्लाइंट बुरी खबर को बुरा मानते हैं, और किन सीनियर स्टाफ़ की साख ऐसी है जिस पर भरोसा किया जा सकता है। इसका इम्प्लीमेंटेशन पूरी तरह सही नहीं है, लेकिन इसमें कमियां कम ही आती हैं और यह कीमत के हिसाब से सही है। दिमागी काम, जिन्हें कभी सुरक्षित माना जाता था—क्योंकि वे कॉन्टेक्स्ट-आधारित फ़ैसलों या संस्थागत, अस्पष्ट जानकारी पर निर्भर थे—वे अब असुरक्षित हो गए हैं।

एआई की वजह से बहुत कम लोगों को नौकरी से निकाला जा रहा है, लेकिन समस्या यह है कि संकट के दौर से गुज़र रही कंपनियाँ नई नौकरियाँ पैदा नहीं कर रही हैं। ग्रेजुएट लोगों के लिए नौकरी का बाज़ार अब तक के सबसे बुरे दौर में है। लॉ फ़र्म, फ़ाइनेंस फ़र्म और अकाउंटिंग फ़र्म – यानी वे कंपनियाँ जो अभी भी ऊँची फ़ीस दे सकती हैं या जिन्होंने समझदारी दिखाते हुए लंबे समय के कॉन्ट्रैक्ट साइन किए थे – उन्होंने भी नई भर्तियाँ रोक दी हैं या कम कर दी हैं।

कैरोलिन के छोटे भाई ने पिछली गर्मियों में लॉजिस्टिक्स मैनेजमेंट में मास्टर्स की पढ़ाई पूरी की और तब से वह नौकरी ढूंढ रहा है। वे महीने में एक बार पेरिस में साथ डिनर करते हैं – पैसे कैरोलिन देती है – और वह उससे पूछता है कि क्या उसे कोई और ट्रेनिंग लेनी चाहिए। उसे समझ नहीं आता कि वह क्या कहे। ये सच है कि नर्सिंग में लोगों की कमी है, लेकिन उसे खून देखकर घबराहट होती है। वह टेक्निकल या कारीगरी वाले कामों के लिए सही नहीं है। वह सिर हिलाता है और एक और बीयर ऑर्डर करता है, और कैरोलिन उसे बात को बदलने देती है।

जिन नेताओं ने AI-विरोधी एजेंडे के दम पर अपना करियर बनाया, उनकी बात सही साबित हुई है। जिन्होंने इस मामले में सावधानी बरती थी, वे अब परेशान हो रहे हैं। यूरोप की राजधानियों में सड़कों पर विरोध-प्रदर्शन आम बात हो गई है – कुछ लोग मज़दूरों के अधिकारों की सुरक्षा की मांग कर रहे हैं, कुछ अमेरिकी एआई पर रोक लगाने की मांग कर रहे हैं, तो कुछ सभी तरह के एआई पर रोक लगाने की मांग कर रहे हैं; और इन सबकी यही मांग है कि कोई न कोई, कहीं न कहीं, इस दिशा में कुछ कदम उठाए।

यूरोपीय इंटेलिजेंस एजेंसियां एक साल से ज़्यादा समय से यूरोप के लोगों को टारगेट करने वाले सुनियोजित सूचना अभियानों (information operations) की ओर इशारा कर रही हैं। ये बातें स्थानीय चिंताओं को ध्यान में रखकर फैलाई जाती हैं: जैसे कि अमेरिकी टेक कंपनियां यूरोप को खोखला कर रही हैं, वॉशिंगटन यूरोप के साथ किसी गुलाम जैसा बर्ताव करता है, और ट्रांस-अटलांटिक रिश्ते एकतरफा हैं। इनमें से कोई भी बात पूरी तरह गलत नहीं है। हेग और बर्लिन ऐसी रिपोर्टें जारी करते हैं जिनमें बीजिंग की ओर इशारा किया जाता है। आम जनता, जो इन बातों के पीछे की भावना से सहमत होती है—चाहे इसे कोई भी फैला रहा हो—उसे इससे ज़्यादा फर्क नहीं पड़ता।

क्रिश्चियन: यूरोप का क्या हाल है?
कैरोलिन: लोग नाराज़ हैं, और ज़ाहिर है कि ऐसा होना ही था।
क्रिश्चियन: यहाँ भी हालात अच्छे नहीं हैं।
क्रिश्चियन: पिछले हफ़्ते एक और डेटा सेंटर पर फ़ायरबॉम्ब से हमला हुआ।
कैरोलिन: मैंने देखा।
क्रिश्चियन: सबको लग रहा है कि वे हार रहे हैं।
क्रिश्चियन: सिवाय लैब्स के।

जून 2030 – एक ऐसा ऑफ़र जिसे आप ठुकरा नहीं सकते

चीन रोबोटिक्स के क्षेत्र में आगे है। लेकिन अब Atlas भी इसमें पूरी तरह से जुट गया है।

इसमें चीन के बराबर बड़े पैमाने पर रोबोट बनाने के लिए इंडस्ट्रियल डेटा और मैन्युफैक्चरिंग क्षमता पर अरबों डॉलर खर्च करने की योजना का ऐलान किया गया है। इसके सी.ई.ओ ने अपनी बात इस तरह रखी: अमेरिका अभी भी एआई सॉफ़्टवेयर में आगे है। अपनी नई ‘वर्ल्ड मॉडल’ टीम की मदद से, वे जनरल-पर्पस रोबोटिक्स के रास्ते में आने वाली आखिरी सॉफ़्टवेयर चुनौतियों को हल करने में कामयाब रहे हैं। लेकिन फिजिकल सप्लाई चेन बनाने में कई साल लगते हैं। अगर Atlas अपने प्रतिद्वंद्वियों से आगे निकल जाता है, तो इसका फ़ायदा बढ़ता जाएगा: जल्द ही, रोबोट उन फैक्ट्रियों को बनाएंगे जो रोबोट बनाती हैं, ठीक वैसे ही जैसे एआई वह कोड लिख रहे हैं जो एआई को बेहतर बनाता है।

चीन की बराबरी करने के लिए अभी बहुत काम करना बाकी है। जहाँ अमेरिका में एक नई रोबोट फ़ैक्ट्री बनाने में दो साल लगते हैं, वहीं चीन में इसमें सिर्फ़ सात महीने लगते हैं। एक दशक से डेटा-सेंटर के बड़े पैमाने पर विस्तार के कारण अमेरिका में ऊर्जा की कमी हो गई है और अमेरिकी लोग एआई से जुड़ी हर चीज़ से नाराज़ हैं; नए प्लांट का स्थानीय स्तर पर विरोध होता है और राज्य के नेता अपने वोटरों का साथ देते हैं। अर्थव्यवस्था की तेज़ी से हो रही बढ़त पर इंफ्रास्ट्रक्चर, असमानता और लोगों की राय की वजह से रोक लग रही है।

इसलिए सी.ई.ओ ने तय किया कि आगे बढ़ने का सबसे तेज़ तरीका कुछ नया बनाने के बजाय खरीदना है – यानी पहले से मौजूद फ़ैक्टरियों को नए काम के लिए तैयार करना। दोस्ताना इन्वेस्टमेंट फ़ंड्स की मदद से, वह ऐसी इंडस्ट्रियल कंपनियों की तलाश में निकले जिनके पास काम लायक जगह हो, जिसे पहियों वाले रोबोट, चार पैरों वाले रोबोट और इंसानों जैसे दिखने वाले रोबोट (ह्यूमनॉइड) बनाने के काम में बदला जा सके।

इस लिस्ट में यूरोप की कार बनाने वाली कंपनियाँ सबसे ऊपर हैं। चीन से कई सालों की टक्कर के बाद, जर्मनी की सबसे बड़ी कंपनी दिवालिया होने की कगार पर है। EV (इलेक्ट्रिक वाहन) के दौर से पहले की अपनी सबसे ऊँची कीमत के मुकाबले, इसकी मार्केट वैल्यू 80% गिरकर €18 बिलियन रह गई है। $13 ट्रिलियन की वैल्यू वाली कंपनी Atlas के लिए यह बहुत छोटी रकम है। लेकिन इससे बहुत बड़ा फ़ायदा हो सकता है। जर्मनी के लेबर कानूनों की वजह से इस कंपनी को अपनी ज़रूरत से ज़्यादा बड़ी वर्कफ़ोर्स को बनाए रखना पड़ा है। अब उन्हें सैलरी देना मुश्किल हो गया है और शेयरहोल्डर पिछले दो सालों से कंपनी से बाहर निकलने का रास्ता ढूंढ रहे हैं। जो कंपनी हर साल करोड़ों रोबोट बनाने के लिए हाई-टेक मैन्युफैक्चरिंग की तलाश में है, उसके लिए यह एक बेहतरीन मौका है।

बर्लिन इससे सहमत नहीं है। वह राष्ट्रीय सुरक्षा के आधार पर बिक्री को रोकता है, लेकिन अंदरूनी लोगों को पता है कि यह मामला राष्ट्रीय गौरव से ज़्यादा जुड़ा है।

Atlas पीछे नहीं हटता। सी.ई.ओ अमेरिकी राष्ट्रपति को फ़ोन करते हैं; राष्ट्रपति पहले ही कह चुके हैं कि जो रोबोटिक्स की दौड़ जीतेगा, वही अर्थव्यवस्था की दौड़ भी जीतेगा, और चीन इतनी तेज़ी से आगे बढ़ रहा है जिसे वॉशिंगटन बर्दाश्त नहीं करेगा। 72 घंटों के अंदर, व्हाइट हाउस घोषणा करता है कि यूरोप से आने वाली कारों पर बहुत ज़्यादा टैरिफ़ लगाया जाएगा। आधिकारिक तौर पर, इस कदम का कार बनाने वाली कंपनी को खरीदने की कोशिश से कोई लेना-देना नहीं है।

तीन हफ़्ते बाद, एक बिक्री की घोषणा की जाती है, हालाँकि इसे पार्टनरशिप का रूप दिया गया है। जर्मन सरकार नई कंपनी में 20 प्रतिशत हिस्सेदारी लेगी और मौजूदा बोर्ड के पास नाममात्र का कंट्रोल रहेगा। प्रेस रिलीज़ में ‘यूरोपियन’ शब्द का इस्तेमाल ग्यारह बार किया गया है।

पर्दे के पीछे, Atlas ही सब कुछ संभालता है। इसके पास ऑपरेशनल बहुमत, मैन्युफैक्चरिंग प्लेटफ़ॉर्म के लिए लाइसेंसिंग अधिकार और भविष्य में पूंजी जुटाने के किसी भी मामले में ‘राइट ऑफ़ फ़र्स्ट रिफ़्यूज़ल’ (सबसे पहले इनकार करने या स्वीकार करने का अधिकार) है। मुनाफा डेलावेयर स्थित एक होल्डिंग फर्म के माध्यम से आता है। बर्लिन अपनी प्रतिष्ठा बचा लेता है, लेकिन बस इतना ही।

अगले कुछ महीनों में यह पैटर्न कई बार दोहराया जाता है। बोर्ड की यह ज़िम्मेदारी होती है कि वह शेयरहोल्डर्स के फ़ायदे के लिए काम करे, और जब ऑफ़र मार्केट वैल्यू से काफ़ी ज़्यादा हो और दूसरा विकल्प दिवालियापन हो, तो शेयरहोल्डर्स का फ़ायदा साफ़ दिखता है। एक के बाद एक, हाई-टेक मैन्युफ़ैक्चरर्स – जैसे रोबोटिक्स, एयरोस्पेस, और खास तरह के टूल बनाने वाली कंपनियाँ – को अमेरिकी वेंचर्स खरीदकर उनका रीस्ट्रक्चरिंग करते हैं। आधिकारिक तौर पर कहा जाता है कि ऐसा करने से नौकरियां बचती हैं और ज़रूरी सुविधाएँ यूरोप में ही बनी रहती हैं, लेकिन असल में यूरोप के पास कोई ठोस काउंटर-ऑफ़र नहीं होता है।

क्रिश्चियन: नंबर ग्यारह
कैरोलिन: मैंने भी गिना।
क्रिश्चियन: हाँ, तुमने तो गिना ही होगा।

अगस्त 2030 – मॉडल कोलैप्स

अमेरिका यूरोप को बर्बाद करने की कोशिश नहीं कर रहा है। वह चीन को एक ऐसी दौड़ में हराने की कोशिश कर रहा है जिसे वह अस्तित्व के लिए ज़रूरी मानता है। लेकिन कैरोलिन के नज़रिए से देखें तो इन दोनों चीजों के बीच का फ़र्क बताना मुश्किल है।

2008 के फाइनेंशियल क्रैश के बाद यूरोप पहले भी ऐसी स्थिति से गुज़र चुका है। टैक्स से होने वाली कमाई घटती है, जबकि वेलफ़ेयर से जुड़ी ज़िम्मेदारियाँ बढ़ जाती हैं। सरकारें ऐसी ग्रोथ के भरोसे कर्ज़ लेती हैं जो असल में नहीं हो रही होती। लेंडर कर्ज़ देने की शर्तें कड़ी कर देते हैं। हर कदम पर, पॉलिसी बनाने वालों के पास विकल्प कम साथ ही ज्‍़यादा खराब होते जाते हैं।

पेरिस में, वित्त मंत्री नेशनल असेंबली में ऐसा बजट पेश करते हैं जिस पर सदन में मौजूद किसी भी व्यक्ति को—खुद उन्हें भी—भरोसा नहीं होता। इसमें तीन ऐसे आंकड़े हैं जिनका आपस में कोई मेल नहीं बैठता: कल्याणकारी योजनाओं पर खर्च कोविड के समय के स्तर के करीब पहुंच रहा है, कॉर्पोरेट टैक्स से होने वाली कमाई में नौ प्रतिशत की गिरावट आई है, और बजट का दसवां हिस्सा लगातार बढ़ते कर्ज के ब्याज और मूलधन को चुकाने में खर्च हो रहा है। इसे किसी तरह बनाए रखने का दिखावा करने का एकमात्र तरीका है विकास के बारे में बहुत ज़्यादा झूटे अनुमान लगाना, जिन्हें हर कोई तुरंत समझ जाता है।

कैरोलिन लंच के समय अपने फ़ोन पर इसे देखती है। वह अपने भाई के बारे में सोचती है। उसे नौकरी नहीं मिली है। उस पर स्टूडेंट लोन है और कोई बचत भी नहीं है, और वह वापस अपने माता-पिता के साथ रहने लगा है। उसके कई दोस्तों ने भी ऐसा ही किया है, और कुछ दोस्तों ने UK जाने के बारे में बात करना शुरू कर दिया है; UK ने - कई लोगों को हैरान करते हुए - एआई ट्रांज़िशन को ज़्यादातर यूरोपीय संघदेशों के मुकाबले कहीं बेहतर तरीके से संभाला है।

Moody ने एक महीने के अंदर ही फ्रांस को ‘नेगेटिव वॉच’ में डाल दिया है। S&P ने भी ऐसा ही किया है। रेटिंग में गिरावट तो बाद में आएगी, लेकिन बाज़ार ने इसे पहले ही मान लिया है। फ़्रांसीसी सरकार के लिए उधार लेने की लागत जर्मनी की तुलना में तेज़ी से बढ़ी है, और यह अंतर सिंगल करेंसी (यूरो) के बनने के बाद से सबसे ज़्यादा हो गया है। बाज़ारों को अब यह भरोसा नहीं रहा कि फ़्रांसीसी यूरो और जर्मन यूरो एक ही चीज़ हैं, या यह कि यूरो ज़ोन एकजुट रह पाएगा।

सितंबर में, फ्रांस का कर्ज चुकाने का खर्च बजट के 12 प्रतिशत से ज़्यादा हो जाता है। नवंबर तक, एजेंसियां तिमाही आधार के बजाय लगातार समीक्षा करने लगती हैं। इटली, स्पेन और ग्रीस की रेटिंग में एक के बाद एक गिरावट की जाती है। इन चारों देशों में, जो पैसा सरकारी खजाने में आता था, वह अमेरिकी बैलेंस शीट में चला गया है, और बचा-खुचा टैक्स बेस कल्याणकारी योजनाओं और कर्ज की बढ़ती लागत के सामने बहुत कम पड़ गया है। हर बार जब नए आंकड़े जारी होते हैं, तो विकास दर के अनुमानों को घटा दिया जाता है।

लगभग उसी समय, लोन मिलने शुरू हो जाते हैं। चीन का सरकारी फ़ंड पुर्तगाल के इंफ्रास्ट्रक्चर बैंक को क्रेडिट लाइन देता है। दूसरा फ़ंड ग्रीस के सरकारी कर्ज़ के एक हिस्से को ऐसी शर्तों पर रीफाइनेंस करता है, जिनका मुकाबला कोई भी यूरोपीय संस्था नहीं कर सकती। तीसरा फ़ंड स्पेन की क्षेत्रीय सरकार को अंडरराइट करता है। कमीशन के एक लीक हुए मेमो में इस पैटर्न को ‘रणनीतिक मकसद से किया गया कैपिटल डिप्लॉयमेंट’ बताया गया है। किसी को पक्का नहीं पता कि असल रणनीति क्या है। कुछ एनालिस्ट का मानना है कि बीजिंग ए.एस.एम.एल या EUV लाइसेंसिंग डील चाहता है; वहीं दूसरों का मानना है कि उनका मकसद बस इतना है कि यूरोप और अमेरिका के बीच दूरियां बढ़ें।

क्रिश्चियन: क्या तुमने फ्रांस के आंकड़े देखे?
कैरोलिन: मुझे ज़्यादा चिंता चीन की लाइफलाइन को लेकर है।
कैरोलिन: हमारी हालत बहुत बुरी हो रही है।
क्रिश्चियन: मुझे अफ़सोस है।
क्रिश्चियन: सच में।

इसके राजनीतिक नतीजे जल्द ही सामने आने लगते हैं। विरोध-प्रदर्शन बढ़ते जाते हैं और आखिरकार हिंसक हो जाते हैं। बर्लेमोंट की स्क्रीन पर पेरिस और रोम में हो रहे दंगे दिखाई देते हैं; इनमें ज़्यादातर युवा होते हैं, जिनकी सोच बस यही होती है कि सिस्टम ने उन्हें निराश किया है। ज़्यादातर यूरोपीय संघदेशों में लोकलुभावन पार्टियाँ – जो अक्सर खुलकर एआई और US के ख़िलाफ़ होती हैं – चुनावों में आगे रहती हैं। यूरोप बिखर रहा है। दक्षिणी यूरोप को उत्तरी यूरोप से मदद की ज़रूरत है, लेकिन जो देश पूरी तरह से कर्ज़ में नहीं डूबे हैं और सैद्धांतिक रूप से मदद कर सकते हैं – जैसे कि जर्मनी – वे भी अपने ही अंदरूनी संकटों से जूझ रहे हैं।

इस गुट के कुछ हिस्से अलग होने लगे हैं। स्लोवाकिया ने व्यापार के अलावा दूसरे मुद्दों पर कमीशन की बातों को गंभीरता से लेने का दिखावा करना बंद कर दिया है। पोलैंड और बाल्टिक देश रूस से सावधान हैं और उन्हें अब यूरोपीय संघपर भरोसा नहीं रहा कि वह उन्हें बचा पाएगा, इसलिए वे अमेरिका के साथ अपने संबंध और मज़बूत कर रहे हैं। नॉर्डिक देशों ने अपने डेटा सेंटर बनाए हैं, जिससे उनके पास बातचीत के लिए कुछ ठोस आधार है; वे ब्रसेल्स के बिना ही अपना एक अलग गठबंधन बना रहे हैं। UK में बहुत से लोगों का मानना है कि ब्रेक्ज़िट शायद एक मामले में तो अच्छा ही रहा: अब वे वॉशिंगटन के साथ एआई से जुड़े द्विपक्षीय समझौते ज़्यादा आसानी से कर सकते हैं।

अटलांटिक के दूसरी तरफ़ स्थिति अलग है। एआई के विरोध का सामना करते हुए, अमेरिकी सरकार ने नौकरी की गारंटी और सीधे कैश ट्रांसफर जैसी योजनाएँ इतने बड़े पैमाने पर शुरू की हैं, जिसकी यूरोप कल्पना भी नहीं कर सकता। वहाँ विरोध-प्रदर्शन रुके नहीं हैं, लेकिन सरकार को कुछ समय ज़रूर मिल गया है। यूरोप की जनता और वहाँ के वित्त मंत्री इस अंतर को अच्छी तरह समझते हैं; उन्हें पता है कि अमेरिकी सरकार के इन कदमों के लिए पैसा एआई से होने वाली उस ग्रोथ से आ रहा है, जो उनकी अपनी अर्थव्यवस्थाएँ नहीं दे सकतीं।

जनवरी 2031 तक यूरो लगातार दबाव में रहता है। दक्षिणी यूरोप से पूंजी बाहर चली जाती है और वापस नहीं आती। ECB बार-बार दखल देता है, लेकिन फिर उसके पास भरोसेमंद उपाय खत्म हो जाते हैं। फरवरी के आखिर तक, इटली और ग्रीस के बैंकों में जमाकर्ता इतनी तेज़ी से अपना पैसा उत्तर की ओर भेज रहे होते हैं कि ECB उसे रोक नहीं पाता; और यूरो अपने मौजूदा रूप में ऐसा नहीं रह जाता जिसका बचाव यूरोपीय अधिकारी निजी तौर पर भी करें।

क्रिश्चियन: तुम कैसे संभाल रही हो?
कैरोलिन: मैं ठीक हूँ।
क्रिश्चियन: सैन फ़्रांसिस्को आ जाओ।
क्रिश्चियन: सच में, हम तुम्हें कल ही नौकरी पर रख लेंगे।
कैरोलिन: मैं जा नहीं सकती।
क्रिश्चियन: क्यों नहीं?
कैरोलिन: किसी को तो यहाँ रुकना ही होगा।

मार्च 2031 – दिग्गजों के बीच

2031 की शुरुआत तक, ताकत दो जगहों पर सिमट गई है। अमेरिकी लैब कॉग्निटिव (दिमागी क्षमता वाले) क्षेत्र में आगे हैं; जबकि चीन अभी भी फिजिकल क्षेत्र में आगे है। अकेले Atlas की कीमत यूरोप की सभी लिस्टेड कंपनियों की कुल कीमत से भी ज़्यादा है। अमेरिका की तीन सबसे बड़ी एआई कंपनियाँ कंप्यूटिंग पर उतना खर्च करती हैं जितना यूरोपीय संघअपनी सुरक्षा (डिफेंस) पर खर्च करता है। चीन की प्रमुख ह्यूमनॉइड बनाने वाली कंपनी एक महीने में उतने यूनिट भेजती है, जितने यूरोप पूरे साल में भेजता है।

ट्रांस-पैसिफिक रिश्तों में बढ़ती तनातनी के कारण ताइवान चर्चा के केंद्र में आ गया है। TSMC की फ़ैब (चिप बनाने वाली फ़ैक्टरियाँ), जहाँ दुनिया की सबसे एडवांस्ड चिप बनती हैं, ज़्यादातर इसी द्वीप पर हैं। पिछले एक साल में अमेरिका और चीन की कॉग्निटिव एआई क्षमताओं के बीच अंतर बढ़ा है और इसके साथ ही ताइवान का रणनीतिक महत्व भी बढ़ गया है। नतीजतन, नौसेनाओं के बीच छोटी-मोटी झड़पें, जो दो साल पहले शायद हर तिमाही में एक बार होती थीं, अब हर हफ़्ते हो रही हैं। दोनों पक्षों ने एआई से चलने वाले हथियारों के प्लेटफ़ॉर्म का सार्वजनिक रूप से और ज़्यादा शक्तिशाली प्लेटफ़ॉर्म का गुप्त रूप से परीक्षण किया है। वॉशिंगटन में लैब और रक्षा विभाग इतने आपस में जुड़े हुए हैं कि उनके बीच का फ़र्क अब ज़्यादा मायने नहीं रखता; बीजिंग में यह जुड़ाव ज़्यादा औपचारिक है। जानकार और विश्लेषक अक्सर ‘ट्रेड’ या ‘कोल्ड’ जैसे शब्दों के बिना ही सीधे ‘युद्ध’ शब्द का इस्तेमाल करते हैं। हर राजधानी में तीन या चार लोगों के पास फ़ैसले लेने की ऐसी ताक़त है जिससे पूर्ण युद्ध छिड़ सकता है।

यूरोप की हालत बहुत खराब है, भले ही कोई भी अधिकारी इसे साफ़-साफ़ कहने को तैयार न हो। समाज में ध्रुवीकरण बहुत ज़्यादा है और सामाजिक ढांचा टूट रहा है। जिन देशों पर एआई के बदलाव का सबसे बुरा असर पड़ा है, वहां आर्थिक विकास रुक गया है। दूसरे देशों में, इसका भलाई से लगभग कोई लेना-देना नहीं रह गया है। उन सदस्य देशों में मॉर्गेज भुगतान में चूक (डेलिंक्वेंसी) की घटनाएं तेज़ी से बढ़ी हैं, जहां आमतौर पर वेरिएबल-रेट वाले लोन का इस्तेमाल किया जाता है। यूरोप का सरकारी कर्ज़ ऐसे स्तर पर ट्रेड कर रहा है जो आम तौर पर उन देशों के लिए होता है जहां लोग ठेले पर नकद पैसे लेकर चलते हैं। पहले अर्थशास्त्री अमेरिका के साथ दौलत के अंतर पर बहस करते थे – क्या यह सिर्फ़ काम के घंटों का नतीजा है, या यूरोप में जीवन स्तर बेहतर है? – अब उन्होंने यह बहस छोड़ दी है; जो लोग कैलिफ़ोर्निया जाते हैं, वे वहां पहुँचने के कुछ ही मिनटों में फ़र्क देख सकते हैं।

लेकिन यूरोप के पास अभी भी एक आखिरी दांव बचा है। पांच साल तक एडवांस्ड एआई सेक्टर बनाने में नाकाम रहने के बावजूद, उसके पास अभी भी वह अहम चीज़ है जिससे होकर पूरी रेस गुज़रती है। ए.एस.एम.एल दुनिया की इकलौती ऐसी कंपनी है जो EUV लिथोग्राफ़ी इक्विपमेंट बना सकती है, जिसका इस्तेमाल अत्याधुनिक चिप बनाने में होता है। इसकी मशीनों तक पहुँच के बिना, अमेरिका एआई में अपनी बढ़त बनाए नहीं रख सकता; और अगर इसकी मशीनें मिल जातीं, तो चीन शायद काफी पहले ही बराबरी कर चुका होता।

बीजिंग ने घरेलू DUVi मशीनों के मामले में अच्छी प्रगति की है और उम्मीद है कि एक साल के भीतर इनका बड़े पैमाने पर प्रोडक्शन शुरू हो जाएगा। लेकिन यह बहुत कम और बहुत देर से उठाया गया कदम है: आज के समय में एक साल का मतलब एक लंबा अरसा होता है, और DUVi से वे अत्याधुनिक चिप नहीं बन पाते जिनकी चीन को ज़रूरत है। अमेरिका हर दिन तेज़ी से आगे बढ़ रहा है। चीनी सरकार को इस बात की गहरी चिंता है कि सुपर-इंटेलिजेंट एआई जल्द ही आने वाला है, और किसी को पक्का नहीं पता कि यह क्या कर सकता है। कुछ सलाहकारों को चिंता है कि अमेरिका बहुत ज़्यादा एडवांस्ड एआई का इस्तेमाल करके चीन के न्यूक्लियर ‘सेकंड स्ट्राइक’ (परमाणु जवाबी हमले) को बेकार कर सकता है। दूसरों कुछ लोगों को डर है कि ऐसे सिस्टम इतने प्रभावशाली हो सकते हैं कि वे खुद पार्टी को अस्थिर कर दें। रोबोट के मामले में चीन की बढ़त तो है, लेकिन इससे वे चिंताएँ दूर नहीं हो सकतीं।

इसलिए बीजिंग उस रणनीति पर और ज़ोर दे रहा है जिसे वह पिछले दो सालों से अपना रहा है। दक्षिणी यूरोप को दिए जाने वाले लोन की रकम बढ़ रही है और शर्तें ज़्यादा आसान होती जा रही हैं। जानकारी फैलाने वाले कैंपेन तेज़ हो रहे हैं। यूरोपीय नेताओं को संकेत मिल रहे हैं कि भविष्य में नज़दीकी रिश्ते कैसे हो सकते हैं: जैसे खास मार्केट एक्सेस, रोबोटिक्स का मिलकर प्रोडक्शन, और ऐसी जगह या मंच पर हिस्सेदारी जहाँ से वॉशिंगटन ने उन्हें काफी हद तक बाहर रखा है। पहली बार, ए.एस.एम.एल और उसकी EUV टेक्नोलॉजी का साफ़ तौर पर ज़िक्र किया जा रहा है। वॉशिंगटन द्वारा एक जागीरदार की तरह बर्ताव किए जाने के पाँच सालों का असर अब दिखने लगा है, और कई राजधानियों में पहली बार गंभीरता से किसी दूसरे विकल्प पर चर्चा हो रही है।

चीन यूरोप को अलग करने की कोशिश कर रहा है और वह इसमें इतनी तेज़ी से कामयाब हो रहा है कि वॉशिंगटन को यह बात परेशान कर रही है। पेंटागन का मानना है कि ए.एस.एम.एल पर से नियंत्रण खोना उतना ही बड़ा खतरा है, जितना कि दुनिया में परमाणु हथियारों का बढ़ना। व्हाइट हाउस को लगता है कि जब तक मौका है, उसे इस कंपनी पर सीधा कंट्रोल कर लेना चाहिए। इसके लिए उन तीन देशों से संपर्क किया जाता है जो इसे रोक सकते हैं: नीदरलैंड, जहाँ ए.एस.एम.एल का हेडक्वार्टर है, और जर्मनी व फ्रांस, जिनकी मंज़ूरी के बिना कोई भी डच सरकार इसके लिए सहमत नहीं हो सकती।

अमेरिका के उप-राष्ट्रपति एक सुरक्षित लाइन पर चालीस मिनट तक बात करते हैं और यह ऑफ़र सामने रखते हैं। इसके मुताबिक, ए.एस.एम.एल को नीदरलैंड और अमेरिका की एक मिली-जुली (जॉइंट) होल्डिंग कंपनी बना दिया जाएगा। इसे चलाने के लिए एक कॉमन बोर्ड होगा, लेकिन प्रोडक्शन, कस्टमर और टेक्नोलॉजी ट्रांसफर से जुड़े तमाम बड़े फैसलों में आखिरी शब्द (कंट्रोल) वॉशिंगटन का ही होगा। इसके बदले में अमेरिका इतना भारी-भरकम पैसा लगाने को तैयार है, जितना जुटाना यूरोप के बस की बात ही नहीं है। इस पैसे से अमेरिका जमीन पर कई नए प्रोडक्शन प्लांट खड़े किए जाएंगे। लेकिन सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि अमेरिका यूरोप के आम नागरिकों के बैंक खातों में सीधे पैसे भेजने का वादा भी कर रहा है। यह रकम अमेरिका एआई कंपनियों को होने वाले अंधाधुंध मुनाफे से तय होगी। शुरुआत भले ही छोटी हो—जैसे हर साल प्रति व्यक्ति करीब €100—लेकिन वक्त के साथ यह रकम बढ़ती जाएगी।

तीनों यूरोपीय नेताओं ने तय किया कि वे इस बात की भनक बाकी यूरोपीय देशों के प्रधानमंत्रियों और राष्ट्रपतियों को नहीं लगने देंगे। उन्हें यह ऑफ़र किसी भी कीमत पर मंजूर नहीं था और डर था कि बाकी देश उन पर इसे स्वीकार करने का दबाव बनाएंगे। इसलिए, जब उन्होंने शालीनता से इस ऑफ़र को ठुकरा दिया, तो व्हाइट हाउस ने इस प्रस्ताव को सरेआम (पब्लिक) कर दिया और साथ ही ‘गाजर के साथ छड़ी’ (लालच के साथ धमकी) वाला रुख अपना लिया। अमेरिका ने साफ चेतावनी दी कि अगर यूरोपीय संघ (EU) ने इस पर दस्तखत नहीं किए, तो ‘फ्रंटियर इन्फरेंस सर्विसेज़ रूल’ के तहत पूरे यूरोपीय क्षेत्र को ‘टियर 3’ में डाल दिया जाएगा। इसका सीधा मतलब यह होगा कि यूरोप अमेरिकी एआई तकनीक के मौजूदा और आने वाले समय के हर तरह के एक्सेस से हाथ धो बैठेगा। अमेरिका अच्छी तरह जानता है कि बाजी पूरी तरह उसके हाथ में है। अपने ताइवानी साझेदारों के दम पर, उसने पहले ही इतनी EUV मशीनें और उनके रखरखाव की जानकारी (नो-हाउ) इकट्ठा कर ली है कि वह ए.एस.एम.एल के बिना भी आराम से काम चला सकता है—उतने वक्त तक, जितने वक्त तक यूरोप फ्रंटियर एआई के बिना टिकने की सोच भी नहीं सकता।

यूरोप की कई राजधानियों ने चीन से संपर्क साधा। वे किसी ऐसे ‘काउंटर-ऑफ़र’ (जवाबी प्रस्ताव) की उम्मीद कर रहे थे, जिसके दम पर वे वॉशिंगटन को मना कर सकें। लेकिन बीजिंग से उन्हें जो मिला, उसकी उन्होंने कतई उम्मीद नहीं की थी। बीजिंग को भी यह समझ आ चुका था कि सिर्फ मीठी बातों से काम नहीं चलने वाला, अब उन्हें भी अपनी भाषा बदलनी होगी। चीन ने साफ कह दिया कि अगर नीदरलैंड्स ने वाशिंगटन के साथ डील की, तो दुर्लभ खनिजों (रेयर-अर्थ एलिमेंट्स) के एक्सपोर्ट नियमों की नए सिरे से समीक्षा की जाएगी। यही नहीं, रोबोट एक्सपोर्ट के लाइसेंसों पर भी दोबारा विचार होगा। और तो और, चीन ने इसके लिए जो समय-सीमा (डेडलाइन) दी, वह अमेरिका से भी कम थी।

यूरोप के पास अब सिर्फ तीन रास्ते बचे हैं, और तीनों ही बदतर हैं।

अगर यूरोप अमेरिका के साथ डील साइन करता है, तो यह महाद्वीप अपने हाथ का इकलौता इक्का (दबाव बनाने का एकमात्र जरिया) भी खो देगा और नाम के अलावा हर मायने में अमेरिकी कठपुतली बनकर रह जाएगा। दूसरी तरफ, अगर चीन ने अपनी धमकी पर अमल करते हुए एक्सपोर्ट रोक दिया, तो यूरोप में बचा-कुचा मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर भी पूरी तरह दम तोड़ देगा।

अगर यूरोप बीजिंग का दामन थाम लेता है, तो मुमकिन है कि उसका दक्षिणी हिस्सा (डूबने से) तबाह होने से बच जाए और यूरोपीय संघ शायद अपने मौजूदा आर्थिक संकट से भी उबर जाए। लेकिन ऐसा करके यूरोप अपने भविष्य की चाबी सीधे चीन के हाथों में सौंप देगा। इसके बाद वाशिंगटन की तरफ से जो पलटवार होगा, उसे झेल पाना यूरोप के बस की बात नहीं होगी—फिर चाहे चीन उसकी कितनी भी मदद क्यों न कर ले। क्योंकि उस वक्त ‘टियर 3’ में डाला जाना तो अमेरिकी गुस्से की सिर्फ एक छोटी सी शुरुआत होगी।

अगर यूरोप किसी के साथ भी समझौता नहीं करता है, तो उसे कुछ नहीं मिलेगा। बल्कि, उसे एक साथ दोनों बड़ी ताकतों की नाराज़गी झेलनी पड़ेगी। इससे सुपर-एडवांस्ड एआई तकनीक (फ्रंटियर इन्फरेंस) और मैन्युफैक्चरिंग के लिए ज़रूरी अहम चीज़ें खोने का खतरा होगा, जिससे पहले से ही दबाव में चल रहा यूरोपीय संघ टूट सकता है।

यूरोपीय काउंसिल एक इमरजेंसी बैठक बुलाती है। चौदह घंटे बीतने के बाद भी बात कुछ खास आगे नहीं बढ़ पाती। आखिरकार, काउंसिल वॉशिंगटन के लिए एक प्रतिनिधिमंडल भेजने की मंज़ूरी दे देती है। हालांकि, उन्हें जो निर्देश (मैंडेट) दिए गए हैं, उनके बारे में कमरे में मौजूद हर कोई जानता है कि उन्हें जान-बूझकर गोलमोल रखा गया है। काउंसिल के आम तौर-तरीकों के उलट, इस बार मुख्य अधिकारी मौके पर ही (हालात देखकर) फ़ैसला लेंगे।

यह बैठक मंगलवार की सुबह आइजनहावर एग्जीक्यूटिव ऑफिस बिल्डिंग में होती है। यूरोपीय प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व डच प्रधानमंत्री, फ्रांसीसी राष्ट्रपति, जर्मन चांसलर, पोलिश प्रधानमंत्री, स्पेनिश प्रधानमंत्री और इतालवी काउंसिल प्रेसिडेंट कर रहे हैं; उनके साथ उनके विदेश मंत्री और राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार भी मौजूद हैं।

अमेरिकी अधिकारी भी अपने साथ ठीक ऐसा ही एक बड़ा दल लेकर आए हैं, साथ ही पिछली लाइन में दो ऐसे अधिकारी भी बैठे हैं जिनका कोई परिचय नहीं कराया गया है और उन्होंने कानों में इयरपीस लगा रखे हैं।

वे इयरपीस एक Frontier एआई मॉडल से जुड़े हैं, जिसने यूरोप के हर उस बातचीत के माध्यम (चैनल) में सेंध लगा दी है जहाँ तक वह पहुँच सकता था। उसे सब पता है। पिछले मंगलवार को जब कैबिनेट की मीटिंग हुई, तो यूरोप के किस मुख्य नेता ने क्या कहा था, इसकी एक-एक जानकारी उसके पास है। उसे यह भी पता है कि उनमें से किसका गुप्त अफेयर चल रहा है, कौन प्रोस्टेट कैंसर के इलाज से गुज़र रहा है, और किसकी बेटी कानूनी पचड़ों में फंसी है। वह यह भी अच्छी तरह जानता है कि इन नेताओं की सबसे कमज़ोर नस क्या है, वे किस चीज़ से सबसे ज़्यादा डरते हैं और उस डर से बचने के लिए वे किस हद तक जाकर सौदा कर सकते हैं। और सबसे बड़ी बात? यूरोप के इन दिग्गजों को इस बात की भनक तक नहीं है।

कैरोलिन उस सपोर्ट टीम का हिस्सा हैं जिसे यूरोपीय कमीशन अपने साथ वॉशिंगटन लेकर आया है। वह मुख्य डेलिगेशन रूम से दो दरवाज़े दूर एक कमरे में बैठी हैं और दीवार पर लगी स्क्रीन पर क्लोज़्ड-सर्किट (CCTV) फ़ीड को लगातार देख रही हैं।

दोपहर होते-होते यह साफ हो जाता है कि बड़े नेताओं के सुर आपस में मिल नहीं रहे हैं। जर्मनी की चांसलर और पोलैंड के प्रधानमंत्री अमेरिकी डील को मंज़ूर करने के लिए पूरा ज़ोर लगा रहे हैं। स्पेन के प्रधानमंत्री चीन के पाले में जाना चाहते हैं, जबकि फ्रांस के राष्ट्रपति दोनों ही प्रस्तावों को सीधे ठुकरा देने के मूड में हैं। नीदरलैंड के प्रधानमंत्री की तबीयत कुछ नासाज़ लग रही है और इटली के काउंसिल प्रेसिडेंट ने तो पिछले तीन घंटों से जैसे अपने होठों पर ताला लगा रखा है।

दोपहर में मीटिंग से एक ब्रेक लिया जाता है। सभी मुख्य नेता अपने-अपने सलाहकारों के साथ अलग-अलग कमरों में चले जाते हैं। कैरोलिन भी कॉफ़ी पीने और थोड़ा दिमाग शांत करने के लिए डेलिगेशन रूम से बाहर निकलती है।

तभी कॉरिडोर में वह लगभग काउंसिल प्रेसिडेंट से टकरा ही जाती है, जो मीटिंग रूम से बिल्कुल अकेले बाहर निकले हैं। उन्होंने अपनी जैकेट उतारकर हाथ में ले रखी है और शर्ट की टाई ढीली कर दी है। वह जितने लंबे दिखते थे, असल में उतने हैं नहीं। कैरोलिन के गले में टंगे आईडी कार्ड (लैनयार्ड) को देखकर उनके कदम रुक जाते हैं।

‘कमीशन से हो?’

‘जी सर, डी.जी. ट्रेड।’

वे एक पल के लिए उसे ऊपर से नीचे तक देखते हैं। ‘मेरे साथ ज़रा चलो।’

वे दोनों कॉरिडोर में धीरे-धीरे टहलने लगते हैं। काउंसिल प्रेसिडेंट की एक आदत है, वे कोई भी बड़ा फ़ैसला लेने से पहले किसी से भी—चाहे वो कोई जूनियर स्टाफ़ हो, पत्रकार हो या उनका खुद का ड्राइवर—अचानक राय मांगने लगते हैं। कुछ लोगों को उनका यह बेबाक अंदाज़ बड़ा पसंद आता है। खैर, इत्तेफ़ाक कहें या उनकी यही सियासी समझ, वे पिछले चालीस सालों से यूरोपीय राजनीति के शिखर पर टिके हुए हैं।

वे कहते हैं, “कमरे के भीतर हर कोई वही घिसी-पिटी दलीलें दे रहा है जो वे पिछले दो सालों से दोहराते आ रहे हैं। मैं यह सब सुन-सुनकर पक चुका हूँ।” वे घूमकर सीधे उसकी आँखों में देखते हैं। “इन तीनों रास्तों में से तुम्हें सबसे ज़्यादा डर किस बात का लग रहा है?”

वह कुछ भी बोलने से पहले एक लंबा पॉज़ लेती है।

“सर, किसी भी पक्ष को न चुनना पहली नज़र में ऐसा लग सकता है जैसे हम अपने सारे विकल्प खुले रख रहे हैं,” वह कहना शुरू करती है, “लेकिन हकीकत में ऐसा है नहीं। हमें किसी एक का हाथ तो थामना ही होगा। हम बस हाथ पर हाथ धरकर नहीं बैठ सकते कि हालात हम पर हावी हो जाएं और बाद में हम खुद को मजबूर परिस्थितियों का शिकार बताने लगें। और हाँ, हम चीनियों को इतनी बड़ी ताक़त तो बिल्कुल नहीं सौंप सकते। इसलिए, घुमा-फिराकर बात अमेरिकी पाले में ही आकर रुकती है।”

काउंसिल प्रेसिडेंट बहुत धीरे से अपना सिर हिलाते हैं। वे ज़ाहिर नहीं होने देते कि वे उसकी बात से सहमत हैं या नहीं। वे उसके कंधे पर हल्के से हाथ थपथपाते हैं, बिल्कुल वैसे ही जैसे परिवार का कोई बुजुर्ग अंकल करता है। ‘शुक्रिया। जाओ, अपनी कॉफ़ी ले लो।’ वे मुड़ते हैं और वापस मीटिंग रूम की तरफ बढ़ जाते हैं।

कैरोलिन सीधे बाथरूम का रुख करती है। वह अपने चेहरे पर ठंडे पानी के छपाके मारती है और आईने में खुद को निहारती है। उसके हाथ बुरी तरह कांप रहे हैं। वह सिंक के किनारों को कसकर पकड़ लेती है और दिल की इस घबराहट के थमने का इंतज़ार करती है। बाथरूम की छोटी और ऊँची खिड़की से उसे वॉशिंगटन के आसमान का एक टुकड़ा दिखाई दे रहा है—जो बिल्कुल सपाट और धुंधला सा चमकदार है।

इसी कॉरिडोर के उस पार, छह लोग मिलकर पूरे यूरोप महाद्वीप की किस्मत का फैसला लिख रहे हैं। उसे नहीं पता कि उसकी कही हुई किसी बात का वहाँ कोई रत्ती भर भी असर होगा या नहीं।

पर उसका दिल कहता है कि कोई असर नहीं होने वाला।

उस शाम वह बिल्कुल तन्हा होटल के लिए पैदल निकल पड़ती है। मार्च के महीने में वॉशिंगटन की हवाओं में अच्छी-खासी ठिठुरन है। चलते-चलते वह अपने भाई के बारे में सोचने लगती है। उसे छह साल पहले हेज़ वैली में हुई वह डिनर पार्टी याद आती है और उस टेबल के चारों तरफ बैठे लोगों का वह शांत, अडिग भरोसा भी याद आता है कि दुनिया अब उनके हिसाब से बदलने वाली थी।

तभी उसकी जेब में फ़ोन वाइब्रेट होता है।

क्रिश्चियन: तुम ठीक हो?
कैरोलिन: बहुत ही थका देने वाला और अजीब दिन रहा।
क्रिश्चियन: मेरी फ़्लाइट लेट हो गई थी।
क्रिश्चियन: मैं एक घंटे में ड्रिंक्स के लिए मिल सकता हूँ।
कैरोलिन: मुझे अच्छा लगेगा।

उपसंहार

यूरोप का अप्रासंगिकता की ओर खिसकना कोई अनिवार्य नियति नहीं थी। 2026 में भी यह महाद्वीप अपनी राह बदल सकता था, बशर्ते उसमें कड़े कदम उठाने का साहस और राजनीतिक इच्छाशक्ति होती।

बैल पर सवार यूरोपा की हरी पच्चीकारी, दो यूरो के सिक्के पर बना शास्त्रीय चित्र।

"उस सुकून भरी रात के सामने घुटने मत टेकना।

बुझती हुई रोशनी को बचाने के लिए अपनी पूरी जान लगा देना।"

डायलन थॉमस, बोटेघे ओस्कुरे, 1951

जून 2034 – प्रोजेक्ट इनहेरिटेंस

रसोई की खिड़की से वे गुंबद साफ़ दिखाई देते हैं। सफेद और धारीदार बनावट वाले ये कुल चार गुंबद हैं, जिनमें से सबसे नज़दीक वाला झाड़ियों के उस पार शायद दो मील की दूरी पर होगा। कैरोलिन को बताया गया है कि ये लूनर बेस (चाँद पर बनने वाले अड्डों) के हूबहू वैसे ही बड़े प्रोटोटाइप हैं, जिनका प्रेशर टेस्ट बिल्कुल शैकलटन क्रेटर जैसे हालातों के बीच किया गया है। साफ़ रातों में वह कभी-कभी एक दूसरा, छोटा गुंबद भी देख पाती है, जो अंदर से जगमगा रहा होता है; वहाँ कंपनी किसी ऐसी चीज़ का टेस्ट कर रही होती है जिसके बारे में कोई नहीं जानता।

वह न्यू मेक्सिको के एक कस्बे के बाहर एक छोटे से मकान में रहती है। सबसे नज़दीकी किराने की दुकान यहाँ से सेल्फ़-ड्राइविंग कार से पूरे बीस मिनट की दूरी पर है। वह अभी-अभी सैंतीस साल की हुई है। और उसे यहाँ रहते हुए डेढ़ साल गुज़र चुके हैं।

उन्होंने ए.एस.एम.एल के साथ बातचीत के आठ महीने बाद, नवंबर 2031 में कमीशन छोड़ दिया। ब्रसेल्स एक बेहद उदास और बोझिल जगह बन चुका था। उनके इस्तीफ़ा देने से ठीक पहले वाली गर्मियों में ताइवान का वह खौफनाक संकट खड़ा हुआ था, जब लगातार चार दिनों तक कोई सो नहीं पाया था; क्योंकि किसी को अंदाज़ा नहीं था कि अमेरिकी एयरक्राफ्ट कैरियर ग्रुप्स आगे बढ़ने से रुकेंगे या नहीं। आखिरकार, उन्होंने बिना किसी अगली योजना या ठिकाने के नौकरी छोड़ दी थी।

क्रिश्चियन ने उनसे एक बार फिर अमेरिका आने की मिन्नत की थी। उन्होंने हर बार की तरह फिर मना कर दिया। लेकिन, ठीक एक साल बाद, उन्होंने हाँ कह दी। वसंत के मौसम में उनकी माँ का देहांत हो चुका था और अब बेल्जियम या फ़्रांस में उनके भाई के सिवा उनका अपना कहने को कोई बचा नहीं था। हालांकि, वह सैन फ़्रांसिस्को नहीं गईं। उन्होंने ना-ना करते हुए भी क्रिश्चियन से पैसे लिए और इस गुमनाम जगह पर आकर बस गईं; यह अमेरिका तो था, लेकिन वो चमक-दमक वाला अमेरिका नहीं।

अब वह और क्रिश्चियन अक्सर एक-दूसरे से मिलते हैं। क्रिश्चियन ने अपनी कंपनी बेच दी है। ईमानदारी से कहें तो वह इस वक्त बेतहाशा अमीर है, और उसने अपने इसी पैसे का एक बड़ा हिस्सा उस काम में झोंक दिया है जिसे वह अपनी ज़िंदगी का सबसे बड़ा मिशन (प्रोजेक्ट) मानता है।

आज सुबह, वह उसी प्रोजेक्ट की तरफ से आने वाली एक कॉल का इंतजार कर रही हैं।

इस मिशन का नाम है Inheritance, जिसका मकसद इंसानियत के यहाँ तक पहुँचने का एक-एक पन्ना, जितना मुमकिन हो, पूरी तरह रिकॉर्ड करना है। एआई मॉडल्स ने पहले ही ईमेल, संसदीय दस्तावेज़ों से लेकर पॉडकास्ट जैसी हर पब्लिक चीज़ को खंगालकर अपने भीतर समेट लिया है। क्रिश्चियन का कहना है कि अब जो कुछ बचा है, वो सिर्फ इंसानों की बेहद निजी कहानियाँ और यादें हैं।

क्रिश्चियन यह सब इसलिए कर रहा है क्योंकि उसे अंदेशा है कि बहुत जल्द—भले ही अभी चीजें साफ़ न हों—इंसान धरती की सीमाओं को लांघकर अंतरिक्ष में फैलना शुरू कर देगा। जैसे-जैसे ये अंतरिक्ष यान ब्रह्मांड की गहराइयों में आगे बढ़ेंगे, धरती से उनका संपर्क धीमा और कमज़ोर होता जाएगा, और आखिरकार एक दिन पूरी तरह टूट जाएगा। वक्त के साथ इंसानों के जीने के तौर-तरीके और उनकी कद्रें (वैल्यूज) भी बदल जाएंगी। उसका मानना है कि अंतरिक्ष के सफर पर निकले ये इंसान अपने इतिहास को जितना बेहतर समझेंगे, वे उतने ही सही फैसले ले पाएंगे—ऐसे फैसले जिन पर उनके पूर्वजों को भी नाज़ होता।

जब क्रिश्चियन ने पहली बार उन्हें यह थ्योरी समझाई थी, तो कैरोलिन हंस पड़ी थीं, लेकिन क्रिश्चियन के चेहरे पर मज़ाक का एक भी भाव नहीं था।

आखिरकार वह इंटरव्यू देने के लिए तैयार हो गईं। वह सचमुच उसकी अहसानमंद थीं—सिर्फ बातों में नहीं, बल्कि पैसों के मामले में भी, क्योंकि क्रिश्चियन ने उन्हें एक बहुत बड़ी रकम दी थी। और वैसे भी, उनके थेरेपिस्ट का—जो कि एआई नहीं, बल्कि हाड़-मांस का एक असली इंसान था—मानना था कि ब्रसेल्स में बिताए उन काले दिनों के बारे में बात करना उनके मानसिक सुकून के लिए बेहतर रहेगा।

उसके लैपटॉप पर एक नोटिफिकेशन टोन (घंटी) बजती है। बटन क्लिक करते ही स्क्रीन पर जो शख्स उभरता है, उसकी उम्र चालीस के आस-पास रही होगी। उसके बाल काले हैं और उसने एक बेहद सॉफ़्ट ग्रे स्वेटर पहन रखा है। वह किसी स्टडी-रूम जैसी दिखने वाली जगह पर बैठा है। वह अपना परिचय डैनियल के रूप में देता है।

कैरोलिन कुछ पल के लिए उसे एकटक देखती है। ‘हे भगवान, मुझे इस बात से सख्त नफ़रत है कि तुम कोई असली इंसान नहीं हो।’

‘मुझे भी,’ वह मुस्कुराते हुए जवाब देता है। ‘क्या मेरा यह रूप-रंग ठीक है? दरअसल, हमारा अनुभव रहा है कि लोग तब ज़्यादा खुलकर बात कर पाते हैं जब इंटरव्यू लेने वाला दिखने में वैसा ही हो जैसा उन्हें सहज लगे।’

‘यह ठीक है,’ वह कहती है।

‘शुक्रिया। जब भी आप तैयार हों, हम शुरुआत कर सकते हैं।’

वह अपने लिए कॉफ़ी बनाती है, वापस आकर बैठती है। वह इस तरह इंतज़ार कर रहा है कि उसका बैठना भी इंतज़ार जैसा नहीं लगता।

‘मैं तैयार हूँ।’

इंटरव्यू लेने वाला अपना सिर हिलाता है। ‘आपने कमीशन में रहते हुए तीन अलग-अलग डायरेक्टरों के तहत काम किया। क्या उन्हें वाकई समझ आ रहा था कि हालात किस तरफ जा रहे हैं?’

‘उनमें से किसी को भी वक्त रहते बात समझ नहीं आई। मेरे दूसरे डायरेक्टर को यह तो अंदाज़ा हो गया था कि एआई का आर्थिक रूप से बहुत बड़ा असर होने वाला है, लेकिन उन्हें लगा कि यह असर ठीक वैसा ही होगा जैसा कभी iPhone के आने से हुआ था। वह यह भांप ही नहीं पाए कि यह पूरी दुनिया को ही निगल जाएगा। मेरी तीसरी डायरेक्टर को यह तो समझ आ गया था कि यह पूरी दुनिया पर छा जाने वाला है, लेकिन उन्हें लगा कि हमारे पास अभी दस साल का वक्त है। जबकि हमारे पास सिर्फ़ दो साल थे।’

‘और आप?’

‘मेरे बाकी साथियों को जब तक यह बात समझ आती, मैं उससे करीब एक साल पहले ही इसे भांप चुकी थी। लेकिन सच कहूँ तो वो भी उम्मीद से तीन साल की देरी ही थी।’

“मुझे 2026 की गर्मियों में ले चलिए। स्ट्रासबर्ग से पहले। वह समय कैसा था?”

“अजीब। बहुत तेज़ी से बदलता हुआ। जर्मनी के चांसलर अभी-अभी सैन फ़्रांसिस्को से लौटे थे और बड़े कदम उठाने के लिए तैयार दिख रहे थे। फ़्रांस के राष्ट्रपति और मेरे बॉस का भी यही मूड था। कुछ हफ़्तों के लिए ऐसा लगा जैसे बंद दरवाज़ा खुल गया हो। मैंने कई रातें जागकर काम किया था।”

“आपने अपने सीनियर अधिकारियों को क्या सुझाव दिया था?”

वह यादों में खो जाती हैं। “हमें अपनी ज़मीन पर उस मेटल (हार्डवेयर) की ज़रूरत थी। डेटा सेंटर, चिप्स, पावर सप्लाई—ये सब यूरोपीय कानून के दायरे में, हमारे अपने इलाकों में होने चाहिए थे, जिन पर वॉशिंगटन सिर्फ़ छह घंटे के नोटिस पर कब्ज़ा न कर सके। यह वो पाँच साल लंबा ‘गीगा-फ़ैक्टरी’ वाला प्रोसेस नहीं था जिस पर सब इतना गर्व कर रहे थे। हमें असली कंप्यूटिंग पावर चाहिए थी। क्षमता दसियों गीगावाट में होनी चाहिए थी। हमें इस कदर निर्माण करना चाहिए था जैसे कोई देश युद्ध लड़ रहा हो।”

इंटरव्यू लेने वाले ने हैरानी से अपनी भौंहें ऊपर उठाईं। “लेकिन उस समय दुनिया की कुल कंप्यूटिंग क्षमता का सिर्फ़ पाँच प्रतिशत हिस्सा ही यूरोप में था।”

“हम उसे बदल सकते थे। दुनिया की कंप्यूटिंग क्षमता लगभग हर साल दोगुनी हो रही थी। अगर हम पूरी जान लगा देते, तो पाँच सालों में इसे पंद्रह या शायद बीस प्रतिशत तक पहुँचा सकते थे। ज़्यादातर यूरोपीय ग्राहकों को जोड़े रखने के लिए इतना काफ़ी होता। इतनी बड़ी कंप्यूटिंग क्षमता का हाथ से निकल जाने का डर ही वॉशिंगटन को वो कदम उठाने से रोक देता जो उन्होंने आखिरकार उठा लिया।”

“आप इसे कैसे पूरा करतीं?”

“यूरोपीय कंपनियाँ इसे अपने दम पर अकेले नहीं कर सकती थीं। हमें अमेरिकियों के साथ भी पार्टनरशिप करनी ही पड़ती। पैसा यहाँ मुख्य मुद्दा नहीं था। सब्सिडी से थोड़ी मदद ज़रूर मिलती, लेकिन इन हाइपरस्केलर्स के पास पैसों की कोई कमी नहीं थी। उन्हें जिस चीज़ की भूख थी, वो थी—रफ़्तार। वे हर नए मॉडल को बाज़ार में उतारने की एक अंधी होड़ में थे। एक सिंगल डेटा सेंटर को भी तय वक्त से एक महीना पहले चालू कर देना उनके लिए अरबों डॉलर की कीमत रखता था।

मैंने दलील दी थी कि यूरोप को स्पेशल कंप्यूट ज़ोन बनाने चाहिए, मंज़ूरी मिलने का समय दो साल से घटाकर महज़ तीन महीने कर देना चाहिए और लालफ़ीताशाही (अफ़सरशाही) की हर रुकावट को जड़ से खत्म कर देना चाहिए। एआई कंपनियों, एनर्जी प्रोवाइडर्स और स्थानीय प्रशासन के बीच सीधा तालमेल बिठाने के लिए खास टीमें तैनात की जानी चाहिए थीं। बंद हो चुके उन पावर प्लांट्स को दोबारा काम में लाना चाहिए था जहाँ ग्रिड कनेक्शन पहले से तैयार खड़े थे। बिजली पैदा करने के नए सोर्सेज पर युद्धस्तर पर काम होना चाहिए था। इस आइडिया का एक बेहद कमज़ोर और छोटा रूप यूरोपीय संघ के टेक सॉवरेनिटी पैकेज में शामिल तो किया गया, लेकिन हम उसे ज़मीन पर लागू करने में पूरी तरह नाकाम रहे।”

“क्यों नहीं?”

“क्योंकि अमेरिकी हाइपरस्केलर्स के लिए रेड कार्पेट बिछाना, अपनी संप्रभुता (सॉवरेनिटी) का सौदा करने जैसा लग रहा था। यूरोस्टैक वाले अपने ही किसी आदर्श सिस्टम को बनाने के सपने देख रहे थे, लेकिन वे वक्त से पूरे दस साल पीछे चल रहे थे। मैंने उनसे साफ-साफ कहा था कि अगर हकीकत का सामना करें, तो हम सारे डेटा सेंटर्स खुद नहीं बना सकते। इसलिए समझदारी इसी में है कि जो भी सेंटर्स यहाँ बनें, उनकी कमान पूरी तरह हमारे हाथों में कसी हो। लेकिन कोई भी राजनेता मंच पर खड़े होकर यह सच कबूल करने की हिम्मत नहीं जुटा पाया। उनके लिए यह बेहद शर्मनाक था।”

इंटरव्यू लेने वाला हामी में सिर हिलाता है।

“आपने बीच की ताकतों (मिडिल पावर्स) के एक गठबंधन के बारे में भी लिखा था।”

“हाँ। हमने ए.एस.एम.एल के मामले में बहुत बड़ी और ऐतिहासिक गलती की, जिससे बेहद आसानी से बचा जा सकता था। हमारी सबसे बड़ी कमजोरी यह थी कि हम सत्ताइस अलग-अलग सदस्य देशों के बीच तालमेल बिठाने की कोशिश में उलझ गए। इसकी जगह अगर मध्यम ताकतों का एक छोटा सा गुट—जैसे नीदरलैंड, जर्मनी, फ्रांस, नॉर्वे, यूके, कनाडा, जापान और दक्षिण कोरिया—यूरोपीय कमीशन की मदद से साथ आता, तो शायद बात बन जाती। इनमें से लगभग हर देश के पास पासा पलटने वाला कोई न कोई इकलौता इक्का मौजूद था। जैसे सप्लाई चेन की अहम कड़ियाँ, एआई टैलेंट या फिर एनर्जी सोर्सेज।

पूरी एआई सप्लाई चेन दुनिया के बस गिने-चुने इलाकों से होकर गुज़रती थी, और हकीकत तो यह है कि उनमें से ज़्यादातर जगहें अमेरिका में थीं ही नहीं। लेकिन हमने कभी जापान या दक्षिण कोरिया के साथ बैठकर इस पर खुलकर बात ही नहीं की। हमने कभी उनसे नहीं कहा कि हम दोनों आज एक ही कश्ती में सवार हैं—दो ऐसे बेरहम साम्राज्यों के बीच फंसे हैं जो हमें सिर्फ अपने फ़ायदे के लिए इस्तेमाल कर रहे हैं। अगर हम अलग-अलग बिखरने के बजाय साथ आ जाएं, तो हमारा पलड़ा कहीं ज़्यादा भारी होगा।

मैं मानती हूँ कि यह राह आसान नहीं होती। इन सभी देशों के वॉशिंगटन के साथ अपने-अपने पेचीदा और उलझे हुए रिश्ते थे। लेकिन एक ऐसा बीच का रास्ता ज़रूर था जहाँ सबका फ़ायदा छुपा था। बस अफ़सोस इस बात का है कि हमने कभी उस रास्ते को तलाशने की संजीदा कोशिश ही नहीं की।”

वह अचानक रुक जाती हैं। अगले कमरे से उन्हें घरेलू सिस्टम की गड़गड़ाहट सुनाई दे रही है, जो कपड़े धोने की तैयारी में जुटा है। बाहर, बजरी से भरे रास्ते पर चार पैरों वाला एक डिलीवरी रोबोट आकर ठहर गया है।

“और क्या?”

“रोबोटिक्स और इंडस्ट्रियल एआई के क्षेत्र में हमारे पास सच में एक बड़ा मौका था। फ्रंटियर इनिशिएटिव उन वर्ल्ड मॉडल्स को तैयार करने में उम्मीद से कहीं ज़्यादा कामयाब रहा था, जिनकी बदौलत आखिरकार रोबोट्स असल जिंदगी में काम करने के काबिल बन पाए। लेकिन हमने न तो इंडस्ट्री के साथ कोई सही पार्टनरशिप की, न ही डेटा के रास्तों को खोला और न ही विदेशी निवेश की कोई जांच-पड़ताल की। नतीजा यह हुआ कि जैसे ही एटलस की नज़र इस पर पड़ी, उसने पलक झपकते ही उन रिसर्चर्स और कंपनियों को खरीदकर अपने पाले में कर लिया।”

इंटरव्यू लेने वाला एक बार फिर हामी में सिर हिलाता है। “जॉब मार्केट के बारे में क्या कहेंगी?”

“फ़्रांसीसी सरकार में मेरा एक दोस्त था, जो लेबर मार्केट के सुधारों पर काम करता था। वह हमेशा इस बात का ज़िक्र करता था कि डेनमार्क पिछले तीस सालों से इसका एक सटीक समाधान चला रहा है—वही पूरा फ्लेक्सीक्योरिटी (flexicurity) का मॉडल। इसमें आप नौकरी गंवाने वाले कर्मचारियों के लिए एक ठोस वेज इंश्योरेंस, री-ट्रेनिंग और असल मदद का इंतज़ाम करते हैं, और इसके साथ ही कंपनियों को उन कर्मचारियों को हटाने की पूरी आज़ादी भी देते हैं जिनके काम का तरीका बदल चुका है। इससे बिज़नेस को इतनी रफ़्तार और लचीलापन मिल जाता है कि वे गहराई से एआई को अपना सकें और ग्लोबल लेवल पर मुकाबले में टिके रहें।

हम इस मॉडल से अच्छी तरह वाकिफ थे। हमारे सामने डेनमार्क के कामयाब आंकड़े भी थे। लेकिन हर सदस्य देश का अपना अलग लेबर कोड था, अपनी यूनियनें थीं और अपने राजनीतिक गठबंधन थे, और कोई भी इस बदलाव के लिए अपनी राजनीतिक साख दांव पर लगाने को तैयार नहीं था। नतीजा यह हुआ कि प्रोडक्टिविटी का फासला लगातार बढ़ता गया और जिस सुरक्षा को हम बचाए रखने का ढोंग कर रहे थे, वह आखिरकार पूरी तरह खत्म हो गई।”

वह कुछ पल के लिए खिड़की से बाहर शून्य में ताकती हैं।

“मैं अक्सर पिछले साल जून के उन दिनों के बारे में सोचती हूँ,” वह इंटरव्यू लेने वाले से ज़्यादा खुद से बड़बड़ाती हैं। “स्पेन के वो दंगे। उन्हें न्यूज़ पर देखना, और भीतर ही भीतर इस अहसास से टूटना कि मैं उन्हें रोकने में पूरी तरह नाकाम रही थी।”

इंटरव्यू लेने वाला चुप रहता है। वह बिना कुछ कहे इंतज़ार करने की इस कला में बेहद माहिर है।

“मैं जानती हूँ कि मुझे खुद को दोष नहीं देना चाहिए, लेकिन मैं फिर भी खुद को कसूरवार मानती हूँ।”

“क्यों?”

“अभी मैंने जो कुछ भी बताया, वह सब आर्थिक ढाँचे से जुड़ा था। जैसे कंप्यूटिंग पावर, सप्लाई चेन और लेबर कोड। लेकिन एक चीज़ जिसे मैं कभी ठीक से सुलझा नहीं पाई—और जो मुझे लगता है कि मेरी सोच से कहीं ज़्यादा मायने रखती थी—वह थी एक ठोस कहानी। यानी एक ऐसा ताना-बाना जो यह समझा सके कि आखिर वे इन सब चीज़ों को होने क्यों देना चाहते थे।

हमारा नज़रिया सिर्फ़ नकारात्मक था। हम डर और तबाही का मंज़र दिखाने में माहिर थे। जैसे हम बस खत्म होने वाले हैं। मैंने जितने भी मेमो लिखे, उन सबकी शुरुआत हमेशा इसी बात से होती थी कि हमारे हाथ से क्या-क्या निकलता जा रहा है। लेकिन हम कोई सकारात्मक उम्मीद या विज़न पेश नहीं कर पाए। आप लोगों से सिर्फ़ इस बुनियाद पर सालों-साल की उथल-पुथल झेलने की उम्मीद नहीं कर सकते कि ‘अगर ऐसा नहीं किया, तो हालात और भी बदतर हो जाएँगे’।”

“हमें उन्हें बताना चाहिए था कि इस नए दौर का एक खूबसूरत और बेहतर रूप कैसा हो सकता है। लेकिन सच तो यह है कि हमें खुद नहीं पता था कि वह कैसा दिखेगा। हमारे पास उस सुनहरे भविष्य को बयां करने के लिए सही शब्द तक नहीं थे। आपको पता है, मैंने कोशिश की थी। मैंने एक बेहद कमज़ोर मेमो भी लिखा था। लेकिन मुझे हार नहीं माननी चाहिए थी, मुझे ऐसे और भी मेमो लिखते रहना चाहिए था।”

इंटरव्यू लेने वाला एक ऐसे अदृश्य नोटपैड पर कुछ नोट करता है जो असल में वहाँ है ही नहीं। “क्या आपको लगता है कि इसी सकारात्मक विज़न की कमी की वजह से वे कड़े कदम कभी मंज़ूर नहीं हो पाए? आपने कहा था कि 2026 की गर्मियों में राजनीतिक हालात काफी डांवाडोल थे।”

“हालात तेज़ी से बदल भी रहे थे और एक जगह थमे हुए भी थे। यहाँ तक कि जो नेता आने वाले कल को भाँप रहे थे, उन्हें भी खुद अपनी सोच पर पूरी तरह यकीन नहीं था। हमारा हर एक कदम एक बेहद बदसूरत समझौते जैसा लग रहा था; जैसे ऐसे लोगों से हाथ मिलाना जिन्हें हम फूटी आँख नहीं सुहाते थे और उन नियमों को कूड़ेदान में फेंकना जिन्हें बनाने में हमने अपनी ज़िंदगी के कई दशक खपा दिए थे। इन कदमों के लिए अपनी बची-कुची पूरी राजनीतिक साख और देश की असली पूंजी को उन चीज़ों पर झोंकना पड़ता, जिन्हें न तो वोटर समझते थे और न ही चाहते थे—और जिनका फ़ायदा भी सालों बाद जाकर मिलने वाला था। उस वक्त संप्रभुता (सॉवरेनिटी) से मिलने वाले किसी भी फ़ायदे को छूकर या महसूस करके देखना नामुमकिन था। मुझे नहीं लगता कि कोई भी राजनेता अपना राजनीतिक करियर दांव पर लगाए बिना वे क्रांतिकारी बदलाव ला पाता जिनकी हमें सख्त ज़रूरत थी। यहाँ तक कि मैं खुद इस बात को लेकर कशमकश में हूँ कि क्या उन्हें ऐसा करना भी चाहिए था या नहीं।”

इंटरव्यू लेने वाला अपना सिर उठाता है। “ज़रा इस बात को और गहराई से समझाइए।”

“मुझे नहीं पता। मैं सचमुच नहीं जानती। इस कहानी का एक पहलू यह भी हो सकता था कि जिन नेताओं ने आने वाले खतरे को देख लिया था, उन्होंने इसे रोकने में अपनी पूरी ताकत और साख झोंक दी, अपनी सरकारें गँवा दीं और उनकी जगह उन लोकलुभावन (पॉपुलिस्ट) नेताओं ने ले ली जो पहले से ही जीत की राह पर थे। और फिर उन नए नेताओं ने आकर पुरानी नीतियों को पूरी तरह पलट दिया, जिससे अंजाम और भी खौफनाक हो गया।”

“और इसके बावजूद आपने वे मेमो लिखे।”

“मैंने साफ देख लिया था कि यूरोप का यह पूरा ताना-बाना ढहने के कगार पर खड़ा है। तो सवाल सीधा सा था—क्या किसी एक सेक्टर के लिए कुछ समय के लिए नियमों को ताक पर रख दिया जाए ताकि बाकी जगहों पर इस सामाजिक मॉडल को बचाया जा सके, या फिर हर जगह नियमों की दुहाई देते हुए इस पूरी व्यवस्था को अपनी आँखों के सामने मटियामेट होते देखा जाए? मैंने पहले रास्ते को चुना। मेरे कुछ साथियों ने तो मुझ पर यूरोप की सोशल-डेमोक्रेटिक जड़ों से गद्दारी करने तक का आरोप लगा दिया। मुझे लिबर्टेरियन तक कहा गया। लेकिन मैंने जो कुछ भी लिखा, वह सिर्फ और सिर्फ इस यूरोपियन प्रोजेक्ट को ज़िंदा रखने की एक आखिरी कोशिश थी। उस वक्त पारंपरिक राजनीतिक मतभेदों का महत्व पूरी तरह खत्म हो चुका था।”

“क्या आपके ज़हन में कभी यह ख्याल आया कि हमें इस रफ़्तार पर ब्रेक लगा देना चाहिए?”

“बिल्कुल आया। बहुत से लोगों ने ऐसा सोचा। अगर मेरे बस में होता, तो मैं वह बटन ज़रूर दबा देती। चीज़ों की रफ़्तार को धीमा करती ताकि समाज को इस बड़े बदलाव के हिसाब से ढलने का थोड़ा वक्त मिल सके, और एआई सेफ्टी पर हो रही रिसर्च इसकी नई और खतरनाक क्षमताओं के स्तर तक पहुँच सके। लेकिन अफ़सोस, हमारे हाथ में ऐसा कोई बटन था ही नहीं। यह पूरी टेक्नोलॉजी यूरोप की सरज़मीं से बाहर विकसित की जा रही थी। अमेरिका और चीन इस अंधी होड़ में पागलों की तरह एक-दूसरे से आगे निकल रहे थे। अगर हमने अपनी ज़मीन पर कोई मज़बूत पकड़ या दबाव बनाने का जरिया बनाया होता, तो शायद हम उन्हें रफ़्तार धीमी करने के लिए मजबूर कर पाते, या कम से कम दोनों महाशक्तियों को इस बात के लिए राज़ी कर पाते कि वे फ़ोन उठाकर एक-दूसरे से बात तो करें। लेकिन हमारे पास मोल-भाव करने की रत्ती भर भी ताकत नहीं थी, इसलिए यूरोप के पास बचने का कोई रास्ता नहीं था; उसे एआई की इसी आग के बीच से होकर गुज़रना था, इससे बचकर निकलने का कोई शॉर्टकट नहीं था।”

वह अचानक रुक जाती हैं।

“तुम्हें पता है, मैंने इस सब मलबे के लिए ज़िम्मेदार चेहरों को ढूंढने की बहुत कोशिश की है। लेकिन आखिरकार मैं इस नतीजे पर पहुँची हूँ कि इस पूरी कहानी में कोई खलनायक (विलेन) था ही नहीं। सच तो यह है कि हमारे फ़ैसले तय करने वाला पूरा ढाँचा उसे मिले इंसेंटिव्स (प्रोत्साहन) के हिसाब से बिल्कुल सही काम कर रहा था, बस अफ़सोस यह था कि वे इंसेंटिव्स उस भयानक स्थिति से निपटने के लिए बिल्कुल भी सही नहीं थे जिसका हम सामना कर रहे थे। यह किसी एक इंसान की गलती नहीं थी, बल्कि यह तो सही जानकारी न मिल पाने, राजनीतिक बेड़ियों और हमारे सिस्टम के वक्त के साथ न बदल पाने का एक सामूहिक फेलियर था। पर कोई भी यह सच सुनना नहीं चाहता, क्योंकि अगर यह मान लिया जाए, तो गुस्सा उतारने के लिए कोई चेहरा नहीं बचेगा—और इंसानों को नफ़रत करने के लिए कोई न कोई चेहरा तो चाहिए ही होता है।”

वह पलटकर इंटरव्यू लेने वाले की तरफ़ देखती हैं।

“तुम्हें क्या लगता है?”

वह कुछ पल के लिए रुकता है।

“क्या मैं आपसे बिल्कुल साफ़-साफ़ बात कर सकता हूँ?”

उनकी भौंहें सिकुड़ जाती हैं।

“मुझे लगता है कि आप सरासर बकवास कर रही हैं।” उसके चेहरे पर एक मुस्कुराहट है।

वह उसे घूरकर देखती हैं।

“क्या कहा तुमने?”

“मैं आपके एनालिसिस पर सवाल नहीं उठा रहा। एनालिसिस तो बिल्कुल सटीक है। लेकिन मेरा दिल यह मानने को तैयार नहीं है कि आपका एनालिसिस और आपकी असली भावनाएं एक ही हैं।”

“क्या मतलब?”

“आप मुझे एक ऐसी बुनी-बुनाई कहानी सुना रही हैं जिसमें किसी का कोई कसूर नहीं है, जहाँ सारे इंसेंटिव्स गलत तरीके से तय थे, जहाँ पूरी विफलता ढांचागत थी, और जहाँ यह भी साफ नहीं है कि नेताओं को कोई कोशिश करनी भी चाहिए थी या नहीं। यह एक बहुत संभालकर तैयार की गई कहानी है। दिमागी तौर पर यह दलील बिल्कुल सही लगती है। पर मुझे नहीं लगता कि यह वो कहानी है जिस पर आप खुद दिल से यकीन करती हैं।”

“तुम नहीं जानते कि मैं किस चीज़ पर यकीन करती हूँ।”

“मैं नहीं जानता। लेकिन मैं एक अंदाज़ा ज़रूर लगा सकता हूँ। मुझे लगता है कि आपके भीतर एक ज़बरदस्त गुस्सा भरा हुआ है। बस मैं यह तय नहीं कर पा रहा कि वह गुस्सा किस पर है।”

वह पूरी तरह खामोश हो जाती हैं।

“मैं गलत भी हो सकता हूँ,” इंटरव्यू लेने वाला कहता है। “मैं हर मर्ज़ की दवा नहीं हूँ। लेकिन आपने खुद मुझसे पूछा था कि मैं क्या सोचता हूँ।”

वह एक लंबे पल के लिए खामोश रहती हैं। खिड़की के पार दिख रहे गुंबद का रंग अब बदल चुका है, वैसा बिल्कुल नहीं है जैसा कॉल शुरू होने के वक्त था।

“ठीक है। तुम जानना चाहते हो कि मेरा गुस्सा किस पर है? मुझे क्रिश्चियन पर गुस्सा आ रहा है। मुझे इस वक्त क्रिश्चियन पर बेहद गुस्सा है, क्योंकि उस कम्बख्त ने मेरी ज़िंदगी के सबसे काले और डरावने सालों को कुरेदने के लिए मेरे सामने एक एआई लाकर खड़ा कर दिया, और अब हद तो यह है कि वो एआई यहाँ बैठकर मेरी थेरेपी भी कर रहा है। मुझे खुद पर गुस्सा है कि मैंने उसके पैसे क्यों लिए। मुझे गुस्सा इस बात पर है कि वह बार-बार एक मासूम चेहरा बनाकर मेरी ज़िंदगी में टपक पड़ता है—वही घिसा-पिटा चेहरा कि ‘मेरे पास एक ऐसा प्रोजेक्ट है जो इंसानियत को तबाह होने से बचा लेगा’—और बदकिस्मती से उसका प्रोजेक्ट भी असली होता है, उसके पैसे भी असली होता है और मैं कभी उसे ‘ना’ कहने की हिम्मत ही नहीं जुटा पाती। क्या तुम यही सब सुनना चाहते थे?”

“कुछ हद तक।”

“इसका क्या मतलब हुआ?”

“मुझे लगता है कि आप अपना असली गुस्सा किसी और चीज़ पर डाइवर्ट (मोड़ रही) कर रही हैं।”

“मेरा साइकोएनालिसिस करने की हिमाकत मत करो।”

वह बेपरवाही से अपने कंधे उचका देता है। कमरे में कुछ पलों के लिए एक भारी खामोशी पसर जाती है। कैरोलिन को खुद अंदाज़ा नहीं होता कि उन्होंने मेज़ के किनारे को कितनी बेरहिमा से भींच रखा है। वह कुछ बोलने के लिए मुँह खोलती हैं और फिर बंद कर लेती हैं।

“ठीक है। हाँ, मुझे गुस्सा आ रहा है। मुझे बहुत ज़्यादा गुस्सा आ रहा है। मुझे अमेरिका और चीन पर गुस्सा है कि उन्होंने अपनी सनक में हमें लगभग तीसरे विश्व युद्ध के मुहाने पर धकेल दिया था। मुझे इस बात पर खून के घूंट पीने पड़ रहे हैं कि हमने मुट्ठी भर सत्ता के भूखे लोगों को अपने पूरे भविष्य का फैसला करने की खुली छूट दे दी। मुझे इन एआई लैब्स पर गुस्सा आता है कि उन्होंने ऐसे ‘हथियार’ बनाकर खड़े कर दिए जिन्हें कंट्रोल करने की औकात खुद उनके पास भी नहीं है। और हाँ, मुझे यूरोप के इन दब्बू नेताओं पर गुस्सा है—उनकी लकीर के फ़कीर बने रहने की आदत, उनकी अंतहीन गोलमेज बैठकें और राजनीतिक माहौल के पूरी तरह तैयार होने का उनका वो बुज़दिलाना इंतज़ार।”

“राजनीतिक माहौल कभी भी खुद-ब-खुद तैयार नहीं होता। कोविड के दौर में भी यह तैयार नहीं था। जब रूस ने यूक्रेन पर हमला किया, तब भी हालात हमारे अनुकूल नहीं थे। लेकिन फिर भी लोगों ने फैसले लिए, काम किए। जब कोविड ने दस्तक दी, तो हम लॉकडाउन में चले गए और रिकॉर्ड समय में वैक्सीन प्रोग्राम खड़ा कर दिया। रूस के हमले के बाद, हमने रातों-रात (शून्य से) LNG टर्मिनल्स खड़े कर दिए और पूर्वी सीमा की रक्षा के लिए हर एक सदस्य देश से आर्थिक मदद जुटा ली। हमने उस वक्त अपने ही बनाए हर नियम को तोड़ा, क्योंकि हमें समझ आ गया था कि हमारा वजूद नियमों को तोड़ने पर ही टिका है।

तुम्हें पता है, मैं अपने नेताओं को किस बात का कसूरवार मानती हूँ? उनकी बेवकूफ़ी या किसी बुरी नीयत का नहीं, बल्कि उनके भीतर हिम्मत की उस कमी का। वे एक ऐसे सच का सामना करने से कतराते रहे जो भले ही समझने में पेचीदा था, लेकिन साफ तौर पर हमारी आँखों के सामने घट रहा था। वे यह कहने का माद्दा नहीं जुटा पाए कि ‘मैं इस खतरे को रोकने के लिए कुछ ऐसा करने जा रहा हूँ जिससे शायद मेरा राजनीतिक करियर हमेशा के लिए खत्म हो जाए, लेकिन मैं इसे फिर भी करूँगा।’ किसी ने ऐसा नहीं किया। एक सिंगल इंसान ने भी नहीं। वे सब बस अपने आस-पास के छोटे-मोटे राजनीतिक फ़ायदों को देखते रहे और उसी धारा में बहते चले गए। उन्होंने खुद को तसल्ली देने के लिए मनगढ़ंत कहानियाँ गढ़ लीं कि उन्हें सिर्फ़ वही फ़ायदे क्यों दिख रहे थे—और उनकी वे दलीलें बहुत नपी-तुली, सोच-समझकर दी गई और मज़बूत थीं, लेकिन हकीकत में असल मुद्दे से उनका कोई लेना-देना ही नहीं था।

यह कुछ ऐसा ही है—बिल्कुल वैसा ही—मुझे नहीं पता कैसे समझाऊँ। मान लो कोई त्रिकालदर्शी (भविष्यवक्ता) आपके दरवाज़े पर आकर कहे कि आपको अगले तीन साल के भीतर ओलंपिक की 200 मीटर फ्रीस्टाइल तैराकी के लिए क्वालिफ़ाई करना है, वरना पूरी दुनिया तबाह हो जाएगी। और आपकी हालत यह है कि आप ढंग से कसरत तक नहीं करते। आप हफ़्ते में बमुश्किल एक बार जिम जाते हैं। दूर-दूर तक ऐसी कोई गुंजाइश नहीं दिखती कि आप क्वालिफ़ाई कर पाएँगे। लेकिन वह भविष्यवक्ता बिल्कुल सच कह रहा है। अगर आप क्वालिफ़ाई नहीं कर पाए, तो सचमुच दुनिया का अंत हो जाएगा। तो ऐसे में आपको क्या करना चाहिए? आपको जी-तोड़ ट्रेनिंग करनी चाहिए। आपको एक पागलों की तरह दिन-रात एक कर देना चाहिए। आपको रात में आठ घंटे की पूरी नींद लेनी चाहिए, सही डाइट खानी चाहिए और दोस्तों से मिलना-जुलना बिल्कुल बंद कर देना चाहिए, क्योंकि दूसरा रास्ता सीधे तबाही की तरफ जाता है। लेकिन आप ऐसा नहीं करते। आप ट्रेनिंग सिर्फ इसलिए छोड़ देते हैं क्योंकि स्विमिंग पूल का पानी बहुत ठंडा है। क्योंकि आप असल में तैराक नहीं, बल्कि टेनिस खेलने वाले इंसान हैं। क्योंकि आप यह मान बैठते हैं कि सिखाने वाले कोच का इसमें कोई अपना निजी फ़ायदा छुपा है। आप कुछ नहीं करते। आप बस सब कुछ अपनी आँखों के सामने तबाह होने देते हैं।

हमने भी ठीक यही किया। हमने इस बर्बादी को चुपचाप होने दिया। हमने खुद को यह पट्टी पढ़ा दी कि यह काम हमसे हो ही नहीं सकता, और हम सब हार मानकर घर लौट गए और इसे होने दिया। और इसी बुज़दिली के लिए मुझे हम सब पर बेहद गुस्सा आता है। क्योंकि यह काम मुमकिन था। इसे किया जा सकता था। मैं यह नहीं कहती कि कामयाबी पक्की थी, लेकिन हमारे पास एक मौका तो ज़रूर था, और हमने कोशिश करने तक की जहमत नहीं उठाई।”

वह अचानक रुक जाती हैं। उन्हें महसूस होता है कि उनकी आँखों से आंसू बह रहे हैं। उन्होंने बरसों से किसी भी इंसान के सामने अपने आंसू नहीं बहने दिए थे, यहाँ तक कि अपने उस असली थेरेपिस्ट के सामने भी नहीं।

वह देखती हैं कि उस डिजिटल इंटरव्यू लेने वाले (AI) में इतनी शालीनता तो है कि उसने अपना मुहँ दूसरी तरफ मोड़ लिया है।

“मैं जानती हूँ कि तुम मुझे अब भी देख सकते हो,” वह कहती हैं।

“जी हाँ।”

“कोई बात नहीं।”

वह अपने आंसू पोंछती हैं। बाहर, वह चार पैरों वाला डिलीवरी रोबोट अब उस बजरी वाले रास्ते से वापस लौट रहा है। कुछ पलों के लिए ढलते हुए सूरज की आखिरी किरणें उसकी चमकीली धातु की परत पर आकर बिखर जाती हैं।

उन्हें वह रोबोट इस वक्त लगभग खूबसूरत सा लगता है।